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समय-समय के साथ ही बॉलीवुड में अलग-अलग ट्रेंड देखने को मिले... कभी एक्शन सीन्स की भरमार लिए फिल्मों ने बॉक्स आफिस पर कमाल दिखाया तो कभी खास तरह की रोमांटिक फिल्मों ने दर्शको को दिलों में जगह बनाई। वहीं अब बॉलीवुड में एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा हैं, जहां अचानक से छोटे शहरों की कहानियां बड़े पर्दे पर खूब दिखाई जा रही हैं। वैसे छोटे शहरों की कहानी वाली फिल्में बॉक्स ऑफिर पर भी अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं.. जैसे कि बात चाहें ‘बरेली की बर्फी’ की करें या हालिया रिलीज फिल्म ‘स्त्री’ की... यूपी, एमपी, बिहार, झारखंड जैसे राज्यों के छोटे शहरों की कहानियां लोगों को खूब पसंद आ रही है। छोटे शहरों की कहानियों के कमाल करने की वजह भी दिलचस्प है... चलिए जानते हैं कि आखिर छोटे शहरों की कहानी कैसे हिट फिल्म का फार्मूला बनी ।
रिएलिस्टिक फिल्मों के दौर में छोटे शहरों की कहानियों को मिला स्पेस
एक समय था जब फिल्मों में कल्पना से परें की भव्यता दिखाई जाती थी... विदेशी लोकेशन, आलिशान बगंले और फैशनेबल कास्ट्यूमस से सजी फिल्में देख हम सभी बड़े हुए हैं, जहां हीरो-हीरोइन वो सब कुछ करने को समर्थ जो कि एक आदमी सपने में भी नहीं सोच पाता है। फिल्मों ने बियॉन्ड दी इमैजिनेशन ऐसे खूबसूरत संसार को रच आम आदमी की दुनिया में जगह पाई। पर धीरे-धीरे समय बदला रिएलिस्टिक फिल्मों का दौर आया जब दर्शकों को काल्पिन नहीं बल्कि रिएलिस्टिक फिल्में पसंद आने लगी।
प्रकाश झा, मधुर भंडारकर जैसे फिल्ममेकर, विशाल भारद्वाज जैसे फिल्मेकर ने 21वीं सदी के पहले ही दशक में ऐसी फिल्मों के लिए जरिए दर्शको का वास्तविकता से सरोकार कराया। लेकिन इसमें भी शुरुआती दौर में जो पहले फिल्में आई उसमें मुम्बई, दिल्ली जैसे शहरों को ही दर्शाया गया। लेकिन धीरे-धीरे इन फिल्मों के बीच छोटे शहरों की कहानी को भी जगह मिली। जिसकी बानगी गैंग ऑफ वासेपुर की अपार सफलता के रुप में दिखी। धनबाद जैसे जगह की कहानी ने दर्शकों को जैसे रोमांचित किया उसका तो अंदाजा भी नहीं था।
ऐसी फिल्मों ने सीधे दर्शको को क्नेक्ट किया
जी हां, अब वो वाला जमाना नहीं रहा जब पर्दे पर हीरो को करिश्माई रूप में देखकर दर्शक रोमांचित हो उछते थें और बल्कि उन्हें अब वो हीरो चाहिए जो उनके जैसा हो। जैसे कि फिल्म रांझणा की ही बात कर लें... इसमें बनारस के शहर में पनपती एक प्रेम कहानी ने लोगों का ध्यान खींचा। क्योंकि इसका हीरो किसी मुम्बई के हीरों माफिक स्टाइलिश नही था बल्कि उसमें यूपी के छोरे का देसी पन दिखा। यूथ को ये हीरो अधिक पसंद आया।
वहीं जब ‘बरेली की बर्फी’ जैसी फिल्म भी छोटे शहरों के लड़को-लड़कियों को ही ध्यान में रखकर बनाई गई थी और इसने दर्शकों को क्नेक्ट भी किया। वहीं आलिया भट्ट और वरूण धवन की फिल्म ‘बद्रीनाथ की दुल्हनियां’ को ही लें इसमें एक छोटे शहर की लड़की की उभरती अकांक्षाओं को दिखाया गया था, कि आज की लड़की का सपना शादी तक ही सीमित नहीं रहा गया बल्कि वे अपने पैरो पर खड़ा होना चाहती है। छोटे शहरों में पनपती ऐसी ही उम्मीदों को इन फिल्मों ने नया आयाम दिया और लोगों ने उन फिल्मों को जी भर के प्यार दिया।
मल्टीप्लेक्स के जमाने में छोटे शहरों का दर्शक भी हुआ आधुनिक
आज आज के समय में छोटे छोटे शहरों में मल्टीप्लेक्स खुल चुके हैं... और वहां के लोग भी बड़े शहरों की लाइफ स्टाइल को कॉपी कर रहे हैं। ऐसे में मॉल जाकर मूवी देखना अब धीरे-धीरे कल्चर में आ रहा है। छोटे शहरों की इसी बदलती कल्चर को हमारी फिल्म इंडस्ट्री भी भुना रही है और इन शहरों के दर्शकों को ध्यान में रखकर ऐसी फिल्में बनाई जा रही हैं, जिससे एक छोटे शहर या कस्बे में रहने वाला व्यक्ति भी भी खुद को क्नेक्ट कर सके। स्त्री, मेरी शादी में जरूर आना, सावधान शुभ-मंगल, टॉयलेट एक प्रेम कथा की सफलता इसी फार्मूले पर आधारित है।
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Author: Yashodhara Virodai
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