Forgot your password?

Enter the email address for your account and we'll send you a verification to reset your password.

Your email address
Your new password
Cancel
वैसे तो फिल्मों का निमाण ही मनोरंजन के उद्देश्य से होता है और हम सभी भी मनोरंजन के लिए फिल्में देखना पसंद करता हैं, लेकिन कुछ फिल्में मनोरंजन से कहीं अधिक हम दे जाती है। जी हां, फिल्में कई बार हमें वे सीखा जाती हैं, जो किसी किताब या स्कूली शिक्षा से नहीं मिलती । ऐसी कई बेहद संवेदनशील और प्रेरणादायी फिल्में हिंदी सिनेमा में बनाई गई हैं, जो कि जीवन के संघर्ष, कठिनाइयों के बीच जीने की राह देती हैं। आज हम ऐसी ही कुछ फिल्मों की बात कर रहे रहें हैं।
वैसे इससे पहले हम आपको इनके बारे में बताए हमारी आपको एक भी सलाह है कि आप इन फिल्मों को अकेले ही देखें और वो इसलिए ताकी फिल्म की हर बात और तथ्यों को आप गहराई से समझ सकें। दरअसल, जब आप आप अकेले होते हैं, तो आपका दिल और दिमाग बेहतर ढंग से काम करते हैं और सामने की चीजों को भी बेहतर ढंग से समझ पाते हैं। वहीं जिन फिल्मों की बात हम कर उसमें जिंदगी के फलसफें को कहानी या पात्रों के माध्यम से आपके सामने रखा गया है, ऐसे में आपको जरूरत है दुनियादारी से थोड़ा सा समय निकालकर इन देखने और समझने का, तो चलिए नजर डालते हैं ऐसी ही कुछ फिल्मों पर..
फिल्म दो आंखें बारह हाथ
1957 में आई फिल्म दो आंखे बारह हाथ बेहद प्रेराणादायक फिल्म थी, जिसे वी शांताराम ने बनाई थी और इस फिल्म में वे लीड रोल में भी थें। फिल्म में वी शांताराम प्रगतिशील और सुधारवादी विचारों के जेलर आदिनाथ के किरदार में थे, जो कि 6 खुंखार कैदियो को सुधारने की कोशिश करता है, इस कोशिश में आई मुश्किलों से फिल्म के साथ कहानी बढ़ती है। फिल्म ने जो सबसे बड़ा संदेश दिया था वो था नैतिकता का संदेश, इंसानियत का पाठ इसी के सहारे जेलर ने कैदियो को सुधारने की कोशिश की थी। फिल्म में कई ऐसे सीन्स थें जिसने लोगों को रूलाया , वहीं इसका गीत ऐ मालिक तेरे बंदे हम आज भी प्रार्थना के रूप में गाई जाती है।
ऐसे में फिल्म की बेहद प्रेरणादायी कहानी लोगो को इतनी भाई कि फिल्म ने सफलता के नए कीर्तिमान गढ दिए... बर्लिन फिल्म महोत्सव में सिल्वर बियर सहित देश-विदेश में इस फिल्म को कई सारे पुरूस्कार मिले । ये फिल्म हिंदी सिनेमा की कालजयी फिल्म मानी जाती है। ऐसे में आपको भी एक बार ये फिल्म जरूर देखनी चाहिए।
मदर इंडिया
1957 में ही आई दूसरी फिल्म मदर इंडिया हिंदी सिनेमा में माइलस्टोन के रूप में जानी जाती है, ये पहली वो फिल्म थी जो ऑस्कर अवॉर्ड तक पहुंची। महबूब ख़ान की इस फिल्म में में नर्गिस के साथ सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार और राज कुमार मुख्य भूमिका में थी। हालांकि ये फिल्म नर्गिस के अभिनय के लिए जानी जाती है, फिल्म में उन्होने ऐसी राधा नाम की औरत का किरदार निभाया था जो अपने पति के जाने के बाद दुनिया भर की मुश्किलों का सामना करते हुए अकेले ही अपने दोनो बेटो की परवरिश करती है, जीवन के इस जद्दों जिहाद में उसे कई परेशानियों का सामन करना पड़ता है। पर आखिर वे अपने उसे जिगर के टुकड़े, अपने बेटे को न्याय के लिए गोली मार देती है। ऐसे में फिल्म की गंभीर कहानी और नर्गिस के अभिनय ने इस फिल्म को हिंदी सिनेमा के इतिहास में अमर कर दिया।
सारांश
1984 में आई ये फिल्म हिंदी सिनेमा की सबसे संवेदनशील फिल्म मानी जाती है, जिससे अनुपम खेर जैसे दिग्गज कलाकार ने इंडस्ट्री में कदम रखा। फिल्म 'सारांश' की कहानी मुबई में रह रहे प्रधान दंपती की है, जिसके न्यूयार्क पढऩे गए जवान बेटे अजय की हत्या हो जाती है। ऐसे में इस बेहद दुखदायी स्थिति का वे कैसे सामने करते हैं वो इस फिल्म का सार है और जीवन का सारांश भी। फिल्म में आखिर में बीवी प्रधान (अनुपम खेर के किरदार) को जीवन का सारांश पत्नी के चेहरे की झुर्रियों में दिखाई पडता है और वो जान पाता है कि जो चला गया, उसका शोक मना रहे हैं और जो सामने हैं और जी रहा है उसे गंवा रहे हैं।' फिल्म की इस संवेदनशील कहानी ने लोगों के दिलों को छू लिया और फिल्म कालजयी हो गई। आप भी इस फिल्म को जरूर देखें ।
इकबाल
साल 2005 में आई ये फिल्म एक गरीब गूंगे लड़के के क्रिकेट के प्रति दीवानगी और देश के लिए खेलने की चाहत को बयां करती है। नागेश कूकूनूर के निर्देशन में बनी फिल्म में श्रेयस तलपड़े ने गूंगे लड़के का किरदार निभाया है। वैस बतौर अभिनेता ये श्रेयस तलपड़े की पहली बॉलीवुड फिल्म थी, जिसके जरिए उन्होने अपनी पहचान बनाई। इस फिल्म में बताया गया है कि कैस अभावों में जीवन के लक्ष्य को साधने की कोशिश कामयाब होती है। अगर आप अपने जीवन के मुश्किल हालातों से परेशान हैं तो आपको ये फिल्म जरूर देखनी चाहिए।
तारे जमीं पर
2007 में आई ये फिल्म एक आठ साल के ऐसे बच्चे की कहानी है, जो कि पढ़ाई में बेहद कमजोर है, ऐसे में उसके पैरेंट्स उसे बोरडिंग स्कूल में भेज देते हैं, जहां उसके आर्ट टीचर उसकी असल समस्या का पहचान पाते हैं कि दरअसल ईशान पढ़ाई में कमजोर नहीं है बल्कि उसे dyslexic की दिकक्त है। यानी कि उसे उसे कुछ एक शब्दों को समझने और बोलने में दिक्कत पेश होती है। उसका स्कूल टीचर उसके इस समस्या का खत्म करने का प्रयास करते हैं। ऐसे में एक बच्चे की मानसिक स्थिति को बयां करती ये फिल्म आपका दिल छू जाएगी।
ऐसी रोचक और अनोखी न्यूज़ स्टोरीज़ के लिए गूगल स्टोर से डाउनलोड करें Lopscoop एप, वो भी फ़्री में और कमाएं ढेरों कैश वो भी आसानी से
Author: Yashodhara Virodai
YOUR REACTION
  • 0
  • 0
  • 0
  • 0
  • 0
  • 0

Add you Response

  • Please add your comment.