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हर जगह नवरात्र की धूम मची है, जगह जगह पंडाल बना दिये गये हैं और इनमें मां दुर्गा की भव्य प्रतिमाएं सज गयी हैं। दुर्गा मां की प्रतिमाएं मिट्टी से बनाई जाती है। ये मिट्टी 10 जगह से लाई जाती है। वह जगह हैं- पहाड़ की चोटी, नदी के दोनों किनारें, बैल के सींग, हाथी के दांत, सुअर की ऐड़ी, दीमक के ढेर, किसी महल के मुख्य द्वार, कोई चौराहा, कोई बलि भूमि और किसी वेश्याले की द्वार की मिट्टी लाई जाती है।
आपने अक्सर सुना ही होगा की मां का मूर्ती बिना वैश्यालों की मीट्टी के अधूरी है। बता दें कि इस बात को लेकर कई सारी मान्यता हैं। पढ़िये यहां...
- एक मान्यता है कि जब कोई व्यक्ति वेश्यालय के द्वार पर खड़ा होता है तो अंदर जाने से पहले अपनी सारी पवित्रता और अच्छाई को वहीं छोड़कर प्रवेश करता है, इसी कारण यहां की मिट्टी पवित्र मानी जाती है। यही कारण है कि वेश्यालों के बाहर की मिट्टी को मूर्ति में लगाया जाता है।
- कुछ पौराणिक कहानियों में जिक्र है कि प्राचीन काल में एक वेश्या मां दुर्गा की अन्नय भक्त थी उसे तिरस्कार से बचाने के लिए मां ने स्वयं आदेश देकर उसके आंगन की मिट्टी से अपनी मूर्ति स्थापित करवाने की परंपरा शुरू करवाई। उसे वरदान दिया था कि उसके यहां की मिट्टी के उपयोग के बिना मूर्ती पूरी नहीं होंगी।
- ये भी माना जाता है कि महिला एक शक्ति है, जिनकी पूजा होनी चाहिए, अगर वो तवायफ बनी है तो इसमें गलती उनकी नहीं बल्कि समाज की है इसलिए उनके घरों की मिट्टी को प्रतिमा में मिलाने से उन्हें सम्मान दिया जाता है क्योंकि मां के आंचल से पवित्र कोई जगह नहीं और जहां कि मिट्टी उनके शरीर पर लगी तो वहां को लोग अपवित्र कैसे हो सकते हैं?
मीडिया की खबरों की माने तो इस साल से पश्चिम बंगाल में वेश्याओं को भी दुर्गा पूजा में आने की अनुमति मिल गयी है।
Author- Anida Saifi
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