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गोबर्धन पूजा को भारत सहित दुनिया के अन्य देशों में बसे हिन्दू बड़े ही धूमधाम के साथ मनाते हैं। इस साल आज गुरुवार को दुनिया सहित भारत में बड़े चाव के साथ लोग गोबर्धन की पूजा में तल्लीन हैं। वैसे भी गोबर्धन पूजा का हमारे पुराणों में बड़ा महत्व दर्शाया गया है। आपको बता दें कि हर साल दीपावली के दूसरे दिन प्रतिपदा तिथि में गोबर्धन की पूजा होती है। इस दिन गोबर्धन पूजा के दिन मुख्य रूप से गोबर्धन पर्वत, गौ माता और भगवान श्री कृष्ण की पूजा का विधान है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब भगवान् श्री कृष्ण ने वृन्दावन के लोगो को इंद्र की पूजा न करके प्रकृति की पूजा करने को कहा तब देवराज इंद्रा कुपित हो उठे थे और उन्होंने वृन्दावन धाम में मूसलाधार वर्षा करके पूरे वृन्दावन धाम को पानी में डुबो दिया था।
रोचक है कि ऐसे में वृंदावन के लोगों में भारी चिंता व्याप्त हो गयी और वे व्याकुल हो उठे। हालाँकि तब भगवान् श्री कृष्ण ही एक ऐसे व्यक्ति बचे थे जिन पर सब लोग भरोसे के साथ आपेक्षित रूप से निहार रहे थे। आपको बता दें कि भगवान श्री कृष्ण वृंदावन के लोगों की अपेक्षा समझ गये हैं फिर उन्होंने देवराज इंद्र का घमंड चकनाचूर करने का निर्णय लिया।
आपको बता दें कि ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण ने इन्द्र के प्रकोप से उपजी मूसलाधार बारिश को रोकने के लिए अपनी कनिष्ठा उँगली से पूरे गोबर्धन पर्वत को उठा लिया था और उसे महज कनिष्ठा के नाखून पर ही रोके खड़े रहे। इस तरह गोबर्धन पर्वत के माध्यम से वृन्दावन के प्राणियों की रक्षा हो गयी। इससे वहाँ के समस्त प्राणियों सहित जानवर, गायें और तमाम चराचर जीवों का जीवन बच सका।
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