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ग़ुस्सा यानी कि क्रोध का जन्म कामना या इच्छा से होता है। उदाहरण देकर यदि आपको समझायें तो जैसे कोई पिता अपने बेटे से एक गिलास पानी माँगता है तो वह उठकर दे देता है। इसके बाद पिता उसकी ख़ूब तारीफ़ करता है कि बेटा शाबाश आदि आदि। इसके बाद वहीं जब वही पिता अपने उसी बेटे से फिर कभी कोई पुस्तक माँगता है कि बेटे पुस्तक उठा दो तो उसका बेटा पुस्तक न उठाये ऐसे में वह पिता अपने बेटे को धूर्त और बिगड़ैल कह देता है और यह कहकर उसकी आलोचना करता है कि उसका बेटा अवज्ञाकारी हो गया है।
आपको बता दें कि इससे पिता को बेटे पर क्रोध आता है। कहने का मतलब साफ़ है कि जब हमारी अपनी कोई इच्छा नहीं पूरी होती है, तो फिर ऐसे में हमें क्रोध आता है। जितना अधिक आप कामना करेंगे उतना अधिक आपको ग़ुस्सा आ जाने की संभावना बनी रहती है।
अतएव जब कभी आपको तेज़ ग़ुस्सा आये तो समझिए कि फिर आपने कोई कामना की है, जिससे आपको ग़ुस्सा या क्रोध आया है। इसलिए कम से कम इच्छाओं को पालकर हम क्रोध को आने से रोक सकते हैं। या फिर यूँ कहें कि क्रोध पर यदि हमें नियंत्रण पाना है तो हम कम से कम कामना या इच्छाएँ पालनी चाहिए।
Author: Amit Rajpoot
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