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क्रोध आना स्वाभाविक है। जी हाँ, आपको बता दें कि क्रोध एक स्वाभाविक और प्राकृतिक प्रकिया है। इसलिए क्रोध से बचना इतना सरल नहीं है। शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसे क्रोध न आये। मगर आपको बता दें कि क्रोध को साधा जा सकता है। यानी कि आप क्रोध से दूरी बनाकर इससे बच सकते हैं। अब बात यह है कि आप आख़िर इससे बच कैसे सकते हैं? चलिए आपको आज बताते हैं कि आप क्रोध से दूरी कैसे बना सकते हैं। इसके लिए आपको अलग से किसी दवा-दारू की कोई ज़रूरत नहीं है और न ही किसी तरह के ध्यान और साधना की।
जी हाँ, दरअसल क्रोध मन की एक जलित और तीव्र कामना है, इसे मारने के लिए आपको अपने मन को बेवकूफ़ बनाने भर की देरी है, क्रोध आपको छू ही नहीं पायेगा। बस, इसके लिए आपको केवल यह सोतना होगा कि आप क्रोध नहीं करेंगे। फिर देखिए आप कैसे मन को मूर्ख बनाकर क्रोध से बच सकते हैं।
अब देखिए, बड़ा दिलचस्प है मन को मूर्ख बनाना है। सोमवार को आप निश्चय करें कि आज से आप क्रोध नहीं करेंगे। चूँकि आपने आज तय किया है कि क्रोध नहीं करेंगे इसलिए आप सोमवार को क्रोध ही क्यों करेंगे भाई।
मंगवार को आप सोचिए कि आज जब मंगल दिन है, तो इसे अमंगल करने के लिए आप क्रोध क्यों करेंगे। इसी तरह बुध को सबसे शुद्ध कहा गया है। ऐसे में क्रोध करके इसे अशुद्ध करने की कोई ज़रूरत नहीं है।
गुरुवार को गुरु का दिन होता है। इसलिए इस दिन गुरु के सामने तो कतई क्रोध नहीं कर सकते हैं। वैसे ही शुक्र को भगवान का शुक्र करें कि आपको इस दुनिया में लाया गया।
अब ज़रा सोचिए न, शनि के दिन क्रोध करके अपना और अनिष्ट भला कोई भला आदमी कैसे कर सकता है। लो, संडे आ गया न। बेहतरीन छुट्टी का दिन। अब आप ही सोचिए कि आपको छुट्टी के दिन क्रोध करके इसे ख़राब करना है कि अपनी छुट्टी को एंज्वाय करना है।
Author: Amit Rajpoot
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