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आप अगर इस समाज में रहते हैं तो काफी तरह की सच्चाई का सामना करना पड़ता है। समय रहते ये पता चलता है कि आपके आस-पास कई ऐसे टॉपिक हैं जिन पर बात करना टैबू से कम नहीं है। इसी टैबू की फहरिस्त में सबसे पहले आता है महिलाओं के पीरियड्स, जिस पर हर कोई बात करने से घबराता है।
लेकिन दूसरी ही तरफ पीरियड्स पर कई किस्म के सतरंगी विज्ञापन बनते हैं जिन्हें हज़म करना काफी मुशकिल हो जाता है। सबसे पहले तो वो सेनेटरी पैड्स पर गिरता हुआ नीले रंग का कुछ लिक्विड दिखाते हैं । फिर पीरियड्स के दिनों में उछलती और कूदती लड़कियां, 'कैसे कर लेती हैं यार'...।
आपको बता दें कि सच्चाई इससे इतर है और काफी कड़वी भी। तो देखिये इन पीरियड्स को लेकर असल ज़िंदगी और विज्ञापन के बीच का सच।
मूड...
आपको बता दूं पीरियड्स के टाइम में, मैं कभी इतनी खुश ना दिखुं और साथ ही इतने अच्छे और महंगे कपड़े कभी याद नहीं आते। मुझे सिर्फ मेरा प्यारा नाइट सूट याद आता है। पता नहीं क्यों विज्ञापनों में लड़कियों को इसी तरह दिखाते हैं लेकिन ये बात सरासर झूठ है।
इतना प्यार कहां से लाते हो भाई...
ये एक और झूठ की पीरियड्स के टाइम पर आप अपने पार्टनर के साथ इंटिमेट हो जाते हैं। कई केस में ऐसा नहीं हो पाता है क्योंकि असल में लड़कियों को मूड स्विंग हो जाते हैं। जिसके चलते इंटिमेट होना तो दूर अपने पार्टनर की हर छोटी बात ज़हर लगती है। हर किसी को अपना पार्टनर याद नहीं आता है। कुछ लोग इस समय संबंध बनाने के बारे में सोचते भी नहीं हैं लेकिन विज्ञापन के अनुसार ऐसा ही होता है।
एक्सरसाइज़...मुछे माफ करना ओम साईं राम...
हर तरफ यही शोर है कि लड़कियों को एक्सरसाइज़ करनी चाहिये खासकर पीरियड्स में। कहते हैं इससे क्रैम्प्स और हर तरह का दर्द दूर हो जाता है। लेकिन मे बताऊं तो में बिस्तर से उठ भी नहीं पाती हूं। तो फिर एक्सरसाइज़ मेरे लिए महज़ एक छलावे से कम नहीं। पता नहीं विज्ञापन वाली लड़कि इतना उछल-कूद कैसे कर लेती है।
सफेद पैंट.. अब तो हद करदी यार...
सफेद कपड़े पहनना और वो भी अपने पीरियड्स में। जी ये गलती कभी मत करियेगा। विज्ञापन एक छलावा है और बेमानी बात है। बाकी अगर आप कॉन्फिडेंट( ओवर कॉन्फिडेंट) हैं तो कर सकती हैं। लेकिन याद रखिये ये मेरी नहीं विज्ञापन की सलह है सफेद कपड़े पहनने की।
सच्चाई तो ये है कि, कुछ लड़कियों को सेनेटरी पैड तक नहीं मिलते हैं।
Graphics credit- Vikas kakkar
Author- Anida Saifi
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