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दिसम्बर के साथ ही कड़क सर्दियों की शुरूआत हो चुकी है, ऐसे में जो लोग ढंड ना लगने का बहाना मार कल तक स्वेटर और जैकेट से परहेज करते थें, आज वो भी डबल स्वेटर से काम चला रहे हैं और अगर आप दिल्ली में रह रहे हैं तो क्या कहना, यहां कि बेदर्द सर्दी तो दूर दूर तक मशहूर है। वैसे एक समय था जब ढंड चाहें कितनी भी ना बढ़ जाए बेर्दद नहीं लगती थी, बल्कि उस वक्त ढंड के दिनों का भी अपना मजा था। जी हां, क्या आपको बचपन के ठंड के दिन याद हैं, जब वक्त की चिंता किए बिना लोग घंटो तक आग के सामने बैठ गप्पे मारते थे... धूप में बैठ जहां महिलाएं स्वेटर बिना करती थीं, बच्चे छतों पर घर-घर खेला करते थे, तभी मूंगफली का स्वाद भी दोगूना लगता था। आज हम बीते सर्दियों की कुछ ऐसी ही यादें आपके लिए लेकर आएं हैं।
सर्द रातों में अलाव के सामने घंटो बैठना
जी हां, आज के समय में जहां हर घर और हर कमरे में ब्लोअर और हीटर की सुविधा मिल जाती है, वहीं जब पहले ऐसी सुविधाएं नहीं थी, तब लोग अलाव से काम चलाते थें। तभी अलाव सिर्फ ठंड ही दूर नहीं करता था, बल्कि आपसी दूरियों को भी मिटाने का काम करता था, दरअसल परिवार के छोटे से लेकर बड़े सदस्य एक साथ उस अलाव के सामने बैठते थें और फिर घंटो बातों का दौर चलता था। आज लोग थोड़े देर के लिए बोन फायर का मजा लेते हैं, तभी हर रोज अलाव के पास ऐसे राते बितती थीं।
धूप की सेंक के साथ स्वेटर की बुनाई
जी हा, पहले ठंड आते ही महिलाओं के स्वेटर बुनने का काम शुरू हो जाता था, तभी हर गली मोहल्ले के चबूतरे पर या घरों की छतों पर धूप सेंकती हुई महिलाएं स्वेटर बुनती नजर आती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं रहा, क्योंकि अब औरतों का सारा वक्त टीवी या मोबाइल के साथ बीतत है, ऐसे में स्वेटर बुनने के लिए ते किसी के पास वक्त ही नहीं बचा।
छत और आंगन में पूरे परिवार की बसेरा
जी हां, तभी धूप सेंकने के लिए घर-परिवार के सदस्य छतों पर इक्ठठा होते थे और फिर लगती थी बैठक। कभी कभी तो छतों पर ही सुबह से शाम हो जाया करती थी। पर अब तो किसी के पास उतना वक्त ही नहीं बचा कि धूंप सेंकने के लिए छत पर बैठे।
मूंगफली और गजक के साथ सर्दियों का मजा
ठंड के दिनों के खाने-पीने के अपने मजे होते हैं और पहले तो ये मजा दोगूना होता था, तभी मूगफली और गजक की सोंधी महक के साथ ही ढंड के दिनों की शुरूआत होती थी और शाम तक खाने पीने का ये दौर चलता रहता था।
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Author: Yashodhara Virodai
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