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बुद्ध तथागत के रूप में जाने जाते हैं। तथागत का अर्थ होता है- वह जो जैसा आया था, वैसा ही चला गया। बौद्ध धर्म के प्रसिद्ध त्रिपटकों में तथागत शब्द का उपयोग भगवान गौतम बुद्ध ने स्वयं के लिए किया है। आपको बता दें कि बुद्ध ने अपने जो पहला उपदेश दिया था, उसे धम्म चक्र प्रवर्तन के रूप में जाना जाता है। उन्होंने इसमें सबसे पहले कहा था, भिक्खो! सुनो। मैं तुम्हें मध्यम मार्ग बताता हूँ। अधिक और अभाव दोनों के अतिवाद से बचने की राह दिखाना हूँ।
शुद्ध, शील हैं बनी तीलियाँ धम्म चक्र की। न्याय, बुद्धि है परिधि चक्र की। हाल, विवेक, मननशीलता और नम्रता नाभि टिकी है, जिसकी धुरी शक्ति की। दुःखमय है जीवन आँसू का सागर। रोग, बुढ़ापा, संतोष और अटलता मृत्यु की, मृत्यु के सतत बोध की। दुःख की माता तृष्णा। नश्वर जग से ऐसे जुड़ना, जिससे दुःख का हर प्रहार पड़ता है सहना।
बुद्ध आगे कहते हैं, कि सांसारिक ऐन्द्रिय सुख की तृष्णा, जाते जाने की अनुरक्त तृष्णा, दुःख का अन्त देखने की झूठी तृण्णा। दुःख से मुक्ति तभी मिलती है, जब मिट जाती है तृण्णा। भिक्खो! एक साथ तुम रह।, एक-दूसरे को सहयोग सतत देते रहो। एक-दूसरे के प्रयासों को शक्ति-युक्ति दो। फ़ैलाओ ये सत्य और सिद्धान्त विश्व के कोने-कोने में। नमो बुद्धाय! नमो बुद्धाय!! नमो बुद्धाय!!!
Author: Amit Rajpoot
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