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लिव-इन रिलेशनशिप का कॉन्सेप्ट एक बार फिर से चर्चा में है। इसके बारे में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फ़ैसला किया है। जी हाँ, इससे पहले कि हम आपको सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फ़ैसले से आपको रू-ब-रू करायें आपका यह जानना बेहद ज़रूरी है कि भारत में लिव-इन का पुरजोर कन्सेफ्ट फलते-फूलते लगभग एक दशक से ज़्यादा हो गया है। बीते इस एक दशक में लिव-इन रिलेशनशिप पर संसद से लेकर सड़क तक कई बार तीखी बहसें हो चुकी हैं, तो वहीं कई ऐसे भी मौक़े आये हैं, जब भारत की उच्चतम न्यायपालिका ने इस विषय पर अपनी ज़रूरी टिप्पणी भी दी है।
मालूम हो कि लिव-इन रिलेशनशिप में एक वयस्क लड़की और एक वयस्क लड़का बिना शादी किये हुए एक साथ एक छत के नीचे जीवन बिताते हैं। हालाँकि भारत की किसी भी सभ्यता में इसे उचित और वैध नहीं माना जाता है। बावजूद इसके लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखकर न्यायालय द्वारा इसमें सहूलियत बरतते हुए इसे वैध करार दिया जा चुका है।
इसके बाद इस व्यवस्था में एक समस्या यह उपजने लगी कि लिव-इन रिलेशनशिप के दौरान अपने पुरुष मित्र के साथ जो लड़कियाँ रह रही थीं, यदि वह किसी मजबूरीवश शादी न कर पाये तो उस पर शारीरिक संबंध बनाये जाने का हवाला देते हुए उस पर अपने साथ दुष्कर्म का आरोप मढ़ सकती थीं। ऐसे कई मामले न्यायालय के समाने प्रस्तुत हुये।
इसी को व्यवस्थित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अब फ़ैसला किया है कि अगर कोई व्यक्ति अपने नियंत्रण के बाहर की परिस्थियों के कारण महिला से शादी नहीं कर पाता है तो लिव-इन रिलेशनशिप के दौरान सहमति से बनाया गया शारीरिक संबंध दुष्कर्म नहीं माना जायेगा। इससे यह साफ़ है कि लिव-इन के जोड़ों के लिए शादी की बाध्यता नहीं है। वे लिव-इन रिलेशनशिप के दौरान आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बना सकते हैं।
आपको बता दें कि जस्टिस एके सीकरी और जस्टिस एस अब्दुल की पीठ ने यह ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा कि “दुष्कर्म और सहमति से बनाए गये यौन संबंध के बीच स्पष्ट अंतर होता है। इस तरह के मामलों को अदालत को पूरी सतर्कता से परखना चाहिए।”
Author: Amit Rajpoot
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