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अमूमन क्लास में कई शिष्यों की हरकतें एक शिक्षक में चिढ़ उत्पन्न कर देती हैं। पढ़ाई के दौरान संवाद करना या छोटी−छोटी ऐसी चालों से अध्यापक परेशान हो जाते हैं। ऐसे में अध्यापक अपना गुस्सा शागिर्दों पर उतारते हैं। अध्यापकों का रोष कई तरह से निकलता है, जैसे बच्चों को चॉक चलाकर मारना, गाली देना या फिर सटीक्स से कुटाई करना।
ये हरकतें शिशुओं के अंतर पर अनुचित प्रभाव डालती हैं। कुटाई के डर से वो विद्यालय नहीं आना चाहता। अपने टीचर से बात करना नहीं चाहता। अकसर पाठशालाओं में बच्चों को भौतिक प्रताड़ना दी जाती है, जिससे बच्चों का मन जख्मी होता है। यों तो स्कूलों में बच्चों की धुनाई पर रोक लग चुकी है। लेकिन छोटे नगरों और कस्बों में ये अब भी होता है।
कुछ साल पहले 2002 में चंड़ीगढ़ में ऐसा ही मामला हुआ, जहां पर अध्यापक ने बच्चों को सजा की शैली पर उनके बाल कतर दिए। बच्चों की गलती यही थी कि अध्यापक के कई बार कहने पर भी बच्चों ने बाल नहीं कटवाए। विद्यालयों में पिटाई पर पाबंदी के बावजूद कई जगहों से ऐसी खबरें आ ही जाती हैं। अभी भी बच्चों को दैहिक सजा देना और उनके साथ गाली−गलौज का क्रम बंद नहीं हुआ है। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि बच्चों को सरेआम पूरी क्लास के सामने डराने और नोटिस देने से शिक्षक अभी भी बाज नहीं आ रहे।
पिटाई से जिद्दी बनते हैं बच्चे
भारत में मां के बाद बच्चों का दूसरा गुरु अध्यापक ही होता है। उन्हें बच्चों की फर्ज इसीलिए दिया जाता है ताकि वे उन्हें ठीक आयाम दे सकें, लेकिन जब अध्यापक मार−पीट और सजा देने पर उतर जाए तो बच्चे के मन में अध्यापक के लिए श्रद्धा समाप्त होता जाता है। कई विद्यालयों में बच्चों को सजा देने पर कानून हैं।
यदि किसी बच्चे के साथ मारामारी या उस पर गुस्सा दिखाया जाता है, तो ये सजा उसके मन पर अनुचित प्रभाव डालती है। इसका नतीजा ऋणात्मक निकलता है और बच्चा धीरे−धीरे हठी बनता चला जाता है। अध्यापक का कार्य है बच्चों की गलतियों पर सूझबूझ से कार्य लेना और खुद पर नियंत्रण रख बच्चों को सही विधि से समझाना।
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