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मानवीय सभ्यता ने समय के साथ-साथ बहुत परिवर्तन बदलाव देखें हैं, हर देश काल के अनुसार अलग अलग व्यवस्थाओं ने जन्म लिया और मानवीय सभ्यता को प्रभावित किया और आज 2019 के रूप में जब हम 21वीं सदी के नए साल में प्रवेश कर चुके हैं तो खुद को अधिक सभ्य और आधुनिक कहलाने का दंभ जरूर भरते हैं। लेकिन अफसोस की समय के साथ स्त्री पुरूष के सम्बंधों की व्याख्या में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं देखने के मिला है... आज भी अगर कोई प्रेमी युगल विवाह या साथ रहने की बात करता है, समाज के कथित ठेकदारों की नजर में वो अनैतिक हो जाता है। समाज में आज भी प्रेम स्वीकार्य नहीं जबकि वहीं अगर कोई विवाहित जोड़ा साथ रहते हुए कोई अनुचित कार्य करता है तो उस पर किसी को कुछ कहना नहीं बनता। समाज की इस दोहरी मानसिकता पर ओशो के विचार बेहद उल्लेखनीय हैं, जिसे हर किसी को जरूर जानना चाहिए।
दरअसल, प्रसिद्ध दार्शनिक और विचारक ओशो ने प्रेम और विवाह पर बेहद ही स्पष्ट तरीके से अपने विचार रखें हैं। असल में, एक बार एक व्यक्ति ओशो के सामने ये समस्या लेकर गया कि शादी के बाद उसकी ज़िंदगी नर्क से भी बदतर हो गई है, इसका क्या कारण और समाधान हो सकता है। जिसके जबाव में ओशो ने कहा कि तुम्हारा विवाह अनैतिक है। अनैतिक, शब्द सुनते ही वो व्यक्ति दंग रहा गया और उसने कहा कि ऐसा कैसे, क्योंकि मैने तो घर परिवार और समाज के सर्व सम्मत्ति से विवाह किया था तो ये कैसे अनैतिक हो गया।
इसका जवाब जो ओशो ने दिया वो कुछ इस तरह था… “तुमने समाज के लिए उस स्त्री से विवाह रचा लिया जिससे तुम्हे प्रेम नहीं था और जब प्रेम नहीं तो विवाह अनैतिक ही होगा, क्योंकि तुम अपने विवाह से खुश नहीं, पर वही जो विवाह प्रेम से निकलेगा, वो अनैतिक नहीं रह जाएगा।
ओशो आगे कहते हैं कि, “ मैने विवाह को अनैतिक कहा, बल्कि विवाह करने को नहीं। असल में जो लोग प्रेम के करेंगे, वे भी साथ रहना चाहेंगे और प्रेम से जो विवाह निकलेगा, वो अनैतिक नहीं रह जाएगा। जबकि समाज में अक्सर लोग इसका उल्टा काम करते हैं। समाज विवाह के बाद प्रेम की बात करता है, जो कि नहीं हो सकता। असल में विवाह तो एक बंधन है जबकि प्रेम एक मुक्ति है। हालांकि जिनके जीवन में प्रेम आया है, वे भी साथ भी जीना चाहेंगे, जो कि स्वाभाविक है। पर साथ जीना प्रेम के साथ ही होना चाहिए ।
ओशो कहते हैं समाज ने स्त्री पुरूष को साथ रखने के लिए विवाह की सस्था बनाई पर असलियत तो ये है कि विवाह के नाम पर सिर्फ साथ होना ही संग होना नहीं है। बल्कि प्रेम दो लोग एक हो जाते हैं पर विवाह की संस्था चाहेगी कि प्रेम दुनिया में न बचे। क्योंकि कोई भी संस्था सहज उदभावनाओं के विपरीत होती है। इसीलिए मै विवाह की संस्था को अनैतिक कह रहा हूं।
ओशो... दो व्यक्ति जब प्रेम करते हैं, तो वो अपने आप में अनूठा ही होता है। हर प्रेम में एक नयापन होता है और वो प्राकृतिक होता है। जबकि जब दो व्यक्ति विवाह करते हैं तब वो अनूठा नहीं होता। क्योंक् ऐसा विवाह तो करोड़ों लोगों ने किया है। असल में विवाह एक पुनरुक्ति है, जबकि प्रेम एक मौलिक घटना है।
Author: Yashodhara virodai
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