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चिकित्सा जगत में रोजाना कुछ न कुछ ऐसा होता रहता है जिसे चमत्कार का नाम देना पड़ता है। लेकिन इस लेख में हम किसी चमत्कार की बात नहीं करेंगे बल्कि अपने ही देश के उस ज्ञान के बारे में बात करेंगे जो काफी साल पहले पुरानी करार दी गई थी और अब उसे अपनाने की बात चल रही है।
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हमारे प्राचीन भारत के इतिहास ने कई ग्रंथ और पांडुलिपियां दिये हैं। कुछ में धर्म तो कुछ में ज्ञान की बातें लिखी हुई है। ऐसी ही एक पांडुलिपि है जिसका नाम नेत्रप्रकाशिका है। इसमें आंखों के इलाज संबंधी 100 से अधिक जानकारियां मौजूद हैं। हालांकि कि आधुनिकता के दौर में हम इसे केवल अनमोल पांडुलिपि का नाम देकर एक कला केंद्र का हिस्सा बना चुके थे।
लेकिन अब सुनने में आया है कि आईजीएनसीए में रखे गए इस पांडुलिपि को डिजिटल रूप दिया जाएगा, साथ ही इसको हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में अनुवाद भी किया जाएगा। इसके बाद इससे आंखों के इलाज में सहायता ली जाएगी। वहीं इस विषय के शोधार्थी इसकी मदद से अपना रिसर्च भी पूरा कर सकेंगें। बता दें कि नेत्रप्रकाशिका के लेखक नन्दकेश्वर है और इसे सन 1440 में लिखा गया था। इसके मूल रूप की भाषा संस्कृत है। इस ग्रंथ में कुल 14 अध्याय हैं।
इस ग्रंथ में आंखों का सूखना, उसमें जलन होना, मवाद भर आना जैसी 100 बीमारियों के इलाज के बारे में लिखा गया है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के एक अधिकारी की मानें तो हमारे देश में कई ऐसी बहुमूल्य ग्रंथ हैं जिनपर अब काम किया जा रहा है और उसे डिजिटल रूप देकर मुख्यधारा में लाने के बाद उसका लाभ लिया जा सकेगा।
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