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अक्सर आकाश मे चांद तारों को निहारते हुए मन में ये विचार आता है कि काश कभी वहां जा पाते हैं, वैसे विज्ञान के जरिए ये काफी हद तक सम्भव हो चुका है। लेकिन अभी भी आम व्यक्ति के लिए ये सम्भव नहीं है कि क्योंकि अंतरिक्ष में सिर्फ प्रशिक्षित वैज्ञानिक और एस्ट्रोनॉट्स ही जा पाते हैं और वो भी सुरक्षा उपकरण और विशेष निरिक्षण के अंतर्गत। क्योंकि स्पेस की जीरो ग्रैविटी में पहुंचते ही इंसान के शरीर में कई सारे बदलाव आने शुरू हो जाते हैं। ऐसे में वहां की लाइफ काफी चैलेंजिंग होती है। आज हम आपको इसी बारे में बताने जा रहे हैं कि स्पेस में एस्ट्रोनॉट्स किस तरह की लाइफ जीते हैं और उन्हें किस-किस तरह के मुश्किल हालातों का सामना करना पड़ता है।
दरअसल, स्पेस की जीरो ग्रैविटी में पैर धरती पर नहीं टिकते, वहीं बॉडी इतनी हल्की हो जाती है लोग उड़ने लगते हैं। ऐसे में वहां ब्रश करने से लेकर नहाने-धोने जैसे छोटे-छोटे दैनिक कार्यो को करने में भी काफी दिक्कतें होती हैं। जैसे कि
सोने के लिए भी करनी होती है मशक्कत
स्पेस यान में सोना भी मशक्कत भरा काम होता है। यहां सोने के आंखों पर पट्टी बांध कर एक बंकर में सोना होता है या फिर अंतरिक्ष यात्री खुद को स्पेसक्राफ्ट के किनारे में बांधकर सोते हैं, ताकि नींद में यहां वहां हवा में ना तैरें।
ऐसे होता है नहाना
स्पेस में नहाना आसान नहीं है, बल्कि इसके लिए एस्ट्रोनॉट्स शावर के नीचे एक बड़े-से बैग में खड़े होकर नहाते हैं। जहां उन्हें पानी से लेकर सीमित सोप और शैम्पू का इस्तेमाल करना होता है ताकि वो इधर उधर ना फैले। वहीं ब्रश करते समय भी ये खास ध्यान रखना होता है, वो ब्रश करने के बाद टूथपेस्ट को थूक भी नहीं पाते हैं। या तो उन्हे इसे निगलना पड़ता है या फिर वे किसी कपड़े में पोंछ लेते हैं।
ऐसा होता है खाना
स्पेस में एस्ट्रोनॉट्स को खाना भी अलग तरीके का होता है, चूकि वहां गुरुत्वाकर्षण होता नहीं है, ऐसे में वहां सिर्फ और सिर्फ डिब्बाबंद और खास तरह का सूखा खाना ही यात्री खाते हैं और ये स्पेशल फूड आइटम्स US, जापान और रूस में तैयार किए जाते हैं। वहीं इनके बर्तन भी ख़ास तरह के बनाए जाते हैं, खान की ट्रे में मैग्नेट लगाएं जाते हैं ताकि जीरो ग्रैविटी में चाकू और फोर्क उड़कर नुकसान न पहुंचा सकें।
ऐसे होता मल-मूत्र का उत्सर्जन
शुरुआती दौर में स्पेस मिशन के एस्ट्रोनॉट्स के यूरिन को सीधे स्पेस में हीं फेंक दिया जाता था। पर बाद में साइंटिस्ट्स को ये एहसास हुआ कि इन यूरिन के कण के कारण स्पेसशिप को ही नुकसान पहुंच सकता है तो फिर अब यूरिन को रिसाइकिल कर पानी में बदल दिया जाता है।वहीं ह्यूमन वेस्ट को पैक कर वापस धरती पर लाया जाता है और यहां लाकर उसे जला दिया जाता है।
रो नहीं सकते
जी हां, आप अंतरिक्ष में यात्री कभी रो नही सकते, क्योंकि भले ही दिल से कितने भी भावुक हो जाएं पर आपके आंखों से आंसू नीचे ही नही गिरेंगे।
Author: Yashodhara Virodai
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