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किंवदंतियों की मानें तो पुराने समय की बात है भारत के किसी गाँव में एक बुढ़िया रहती थी। वह हर शीतलाष्टमी के दिन माँ शीतला को ठंडे पकवानों का भोग लगाती थी। माँ को भोग लगाने के बाद ही नह बूढ़ी औरत कुछ भी प्रसाद ग्रहण करती है। आपको बता दें कि उस बुढ़िया के अलावा अन्य कोई और माँ शीतला का पूजन नहीं करता था। एक दिन गाँव में आग लग गयी। काफी देर बाद जब आग शांत हुयी तो दिखा कि गाँव में सबके घर जल गये हैं, लेकिन उस बुढ़िया का घर सुरक्षित ही रहा। कौतूहलवश गाँव वाले उस बुढ़िया के घर पहुँचे और इस चमत्कार का कारण पूछा। बुढ़िया ने माँ शीतला को भोग लगाने वाली बात गाँव वालों से साझा की।
बुढ़िया की बात सुनकर गाँव वालों ने भी यह निश्चित कर लिया कि अब वह भी शीतला माता को हर शीतला अष्टमी के दिन भोग लगाएगे और इसके बाद ही वह कुछ प्रसाद ग्रहण किया करेंगे। वास्तव में शीतला माता धीरज का प्रतीक हैं। इसीलिए वह शीतल भोजन और शीतल पेय का चढ़ावा लेती हैं। आपको बता दें कि यह सब माता शीतला के लिए प्रतीक स्वरूप है। इन्हीं कई प्रतीकों में से एक गधा भी है।
जी हाँ, गधा एक बेहद धीरज वाला और शान्त स्वभाव का प्राणी होता है। इसके प्रतीक के ज़रिए शीतला माता यह संदेश देती हैं, कि हर मनुष्य को न सिर्फ अपना मन बल्कि तन भी शान्त और शीतल रखना चाहिए। अर्थात् इंसान को हर परिस्थिति में धीरज से काम लेना चाहिए और निरन्तर परिश्रम करना चाहिए। वास्तव में इसी से जीवन में सफलता मिलती है और जीवन सुखमय बीतता है।
Author: Amit Rajpoot
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