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भगवान बुद्ध कहते हैं कि हर दिन के पल को चेतना के साथ मन में जी लो। जो पीछे चला गया न उसका राग मन में हो। न ही आने वाले कल के सपनों की नींद में डूबे रहो। इसी क्षण यानी कि सचेत अवस्था में पूर्ण जियो। अंधविश्वास किसी पर मत करना चाहे वो धर्मग्रन्थ हो या फिर किसी महानुभाव का कहना। जब तक वह तुम्हारी अपनी बुद्धि और विवेक पर खरी न उतरे तब तक उसे स्वीकार करने का कोई भी औचित्य नहीं है।
अज्ञान ही सारी विषमताओं की जड़ में है। अज्ञान न पूजा, न व्रत और न चढ़ावों से दूर होता है। अज्ञान तो केवल ध्यान से दूर होता है। सौन्दर्य अनित्य है। इसीलिए भाव विभोर से मुक्त पुरुष न सुन्दरता से आकर्षित होता है और न ही सम्मोहित इसके अलावा वह कुरूपता से विरक्त भी नहीं होता है।
सत्य के मार्ग में चलते हुए दो भूल हो सकती है। पहली, कि सत्य के मार्ग पर चलते हुये पूरा मार्ग तय न करना। दूसरा, उसे आरम्भ ही न करना। जीवन-मरण हर मनुष्य के जीवन का क्रम है। यदि हम चैतन्य होकर इसके विधान को समझें तो हम ऐसा बेहतरीन जीवन जी सकते हैं, जहाँ शान्ति, सद्बुद्धि और आनन्द का सर्वदा वास होगा।
भगवान बुद्ध ने चार आर्यक सत्यः
भगवान बुद्ध ने चार आर्यक सत्य के बारे में चर्चा की है। एक, जब तक सृष्टि रहेगी दुःख मनुष्यों के साथ छाया की तरह चलेगा। दो, इस दुःख कारण है वस्तु से स्वयं को पकड़ के रखना। जो वस्तु क्षणभंगुर है, तो मार्ग क्या होगा। यक़ीनन कोई मार्ग ही न होगा। तीन, मुक्ति के लिए विवेक जगाना आवश्यक है। स्वयं को केन्द्रित रखो। जो आये, चाहे दुःख की सूचना या फिर सुख की सूचना उसके बीच स्वयं को स्थिर रखों। चार, इस मार्ग पर दुःख के बंधन टूटेंगे और परम सत्य की उपलब्धि होगा।
Author: Amit Rajpoot
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