Forgot your password?

Enter the email address for your account and we'll send you a verification to reset your password.

Your email address
Your new password
Cancel
धर्म एक ऐसा शब्द है जिसका आज के ज़माने में सबसे विकृत ढंग से उपयोग किया जाता है। आज इसे दुकानदारी, नफ़रत और न जाने किस-किस चीज़ का पर्याय बना दिया गया है। भारतीय संदर्भों में देखें तो धर्म का अर्थ ईश्वर की उपासना बिल्कुल भी नहीं है। इसका संबंध है मनुष्य के व्यवहार से। जी हाँ, मनु कहते हैं कि कर्मों के विवेचन के लिए धर्म-अधर्म का विभाग किया गया है, जबकि उन्होंने धर्म के लक्षण बताये हैं- धीरज रखना, क्षमा करना, मन व इंद्रियों का संयमन, दूसरों की वस्तुओं पर अधिकार न जताना, क्रोध न करना, सत्य बोलना, विद्या अर्जित करना, बुद्धि का उपयोग करना आदि।
मनु के अलाव महर्षि कणाद कहते हैं, कि जिससे इस संसार का वैभव और आत्मिक शान्ति दोनों की प्राप्ति हो, वही धर्म है। महर्षि जैमिनि कहते हैं, कि जिससे श्रेष्ठ कर्मों को करने की प्रेरणा मिले वह धर्म है। महर्षि वेद व्यास कहते हैं कि जो व्यवहार अपने साथ नहीं पसंद न हो, वैसा दूसरों के साथ नहीं करना ही धर्म है। कुल मिलाकर धर्म की इन सारी व्याख्याओं में कहीं भी ईश्वर नहीं है। इनका संबंध केवल और केवल हमारे आचरण से है।
आपको बता दें कि जीवन जीने के लिए जिन आवश्यक कलाओं की ज़रुरत होती है, यथा बड़ों का सम्मान करना, जिससे उपकार मिलता है उसकी पूजा करना, अहिंसा और परोपकार का आचरण आदि ये सब अति प्राचीन हैं। इस तरह की जीने की कला सिखाने वाली जो प्रक्रियाएँ हैं वही धर्म मानी जाती हैं।
ग़ौरतलब है कि बहुत से लोगों का यह प्रश्न रहता है कि धर्म की उत्पत्ति कैसे हुयी है। उनको यह समझना ज़रूरी है कि धर्म की उत्पत्ति सृष्टि में जीवों के साथ ही हुयी है, क्योंकि हरेक जीव अपनी उत्पत्ति से ही अपने धर्म का पालन करता ही आ रहा है। बाद में इसमें जोड़ी गयीं ईश्वर की अनेक उपासना विधियाँ धर्म का आवश्यक अंग हैं।
Author: Amit Rajpoot
ऐसी रोचक और अनोखी न्यूज़ स्टोरीज़ के लिए गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड करें Lop Scoop App, वो भी फ़्री में और कमाएँ ढेरों कैश आसानी से!
YOUR REACTION
  • 0
  • 0
  • 0
  • 0
  • 0
  • 0

Add you Response

  • Please add your comment.