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गौतम बुद्ध के चार आर्यक सत्य का पालन करने व्यक्ति जीवन को पार कर सकता है। जी हाँ, भगवान गौतम बुद्ध अपने इन चारों आर्यक सत्य का प्रतिपादन करते हुये कहते हैं कि जो ज्ञान मैंने अपने अनुभव से प्राप्त किया है, उसी की ही बात कहता हूँ। आगे भगवान बुद्ध कहते हैं कि अज्ञान ही दुःख, भ्रम और चिंता को जन्म देता है। अभिमान, लोभ, क्रोध, भय, दुविधा और ईर्ष्या इसी अज्ञान की संतान हैं। माया का खेल विपरीत का है। दो रूपों का है। मध्य में ही रहो, धूमकेतु तारे की तरह। न शरीर को सुखाओ और न ही उसकी वातना को चारा खिलाओ। मध्य में ही केन्द्रित रहो।
बुद्ध आगे बताते हैं कि जब हम माया के द्वैत रूप को पहचान लेते हैं, तो सब दुःख और चिंता समाप्त हो जाती है। तब हमारे भीतर प्रेम और स्वीकृति का भाव आ जाता है। इसके बाद हम किसी से घृणा नहीं करते हैं। आगे भगवान बुद्ध ने 4 आर्य सत्य बताए हैं। आइए बुद्ध के उन चार आर्यक सत्य को जानें।
पहला आर्यक सत्यः
जब तक ये सृष्टि रहेगी, तब तक दुःख मनुष्य के साथ छाया बनकर चलेगा।
दूसरा आर्यक सत्यः
इस दुःख के कारण हैं, किसी वस्तु को ख़ुद से पकड़कर रखना। जो वस्तु स्वयं क्षणभंगुर है, वह किसी तरह का मार्ग कैसे होगी।
तीसरा आर्यक सत्यः
मुक्ति के लिए विवेक का जागना अति आवश्यक है। स्वयं को केन्द्रित करो। जो आये चाहे दुःख की सूचना या आनन्द की परछाई इसके बीत स्वयं को स्थिर रखो।
चौथा आर्यक सत्यः
इस मार्ग पर सुख के बंधन टूटेंगे और परन सत्य की प्राप्ति व उपलब्धि होगी। अब सवाल है कि ये मार्ग क्या होंगे। आपको बता दें कि ये अष्टांग मार्ग हैं- इसके माध्यम से सम्यक ज्ञान, सम्यक विचार, सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक जीवन यापन, सम्यक प्रयास, सम्यक चेतना और एकाग्रता संभव होती है।
Author: Amit Rajpoot
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