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बहुत से महात्माओं ने मनुष्य के कल्याण के लिए अनेक से साधन बताए हैं। लेकिन इनमें से कौन सा साधन भगवान का ध्यान लगाने के लिए सबसे उपयुक्त है यह प्रश्न सबसे अहम है। इसलिए आपको बता दें कि भिन्न-भिन्न जातियों के मनुष्यों का स्वभाव और वासनाएँ सतोगुण, तमोगुण और रजोगुण के कारण भिन्न-भिन्न हैं। इसलिए वे सभी अपनी-अपनी सोच के अनुसार वेदवाणी की अर्थ निकालते हैं। वेदों की वाणी है ही ऐसी अलौकिक कि उसके भिन्न-भिन्न अर्थ निकलते ही हैं। कुछ लोग तर्क-वितर्क में इतना उलझ जाते हैं, कि तमाम फिजूल के कर्म काण्डों को अपना लेते हैं और उसी को वे धर्म समझने लगते हैं।
जी हाँ, बहुत से लोगों के साथ ऐसा ही है, जबकि कर्मयोगी व्यक्ति दान, व्रत, यज्ञ, तप, संकल्प और रीति-रिवाज आदि को ही पुरुषार्थ बताते हैं। परन्तु ये सभी तो कर्म हैं और इन कर्मों के फल समाप्त हो जाने के बाद तो इनसे केवल दुःख ही मिलता है और इनके फलस्वरूप मिलने वाले व्यक्ति भी मनुष्य को केवल जन्म-मृत्यु के चक्कर में ही फँसाये रखते हैं। इसलिए इन विभिन्न साधनों के फेर में नहीं पड़ना चाहिए।
जो सभी तरफ से बेपरवाह हो गया है। किसी भी कर्म या उसके फल की अभिलाषा नहीं रखता है और अपने अंतःकरण को मुझे समर्पित कर चुका है, ऐसे परमानंद भक्त की आत्मा के रूप में मैं स्वयं प्रगट होने लगता हूँ। इससे वह जिस सुख का अनुभव करता है वह इस संसार में उलझे मनुष्यों को किसी भी तरह से प्राप्त नहीं कर पाता है।
इसलिए भगवान का ध्यान लगाने का सबसे उपयुक्त नियम यही है कि आप अपने चित को साधने की कोशिश करिए और उसी का ध्यान लगाइए। भगवान को सांसारिक वासनाओं से दूर ख़ुद में निःस्वार्थ ढूँढ़ने वाले भी भगवान को प्राप्त कर पाते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि भगवान को आप अपने भीतर ही खोजें।
Author: Amit Rajpoot
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