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दान एक पुण्य कर्म है। इसलिए असल बात यही है कि हम सभी को थोड़ा बहुत दान व पुण्य तो करना ही चाहिए। कई बार ऐसा होता है कि जब हम दूसरों को किसी न किसी माध्यम से सुखी बनाते हैं या फिर आपके माध्यम से किसी का अच्छा होता है या उसे ख़ुशी मिलती है, तो इससे आपका भी भला होता है, क्योंकि वास्तविक मायनों में इससे बेहुत ज़्यादा ख़ुशी मिलती है। आपको बता दें कि ऐसा ख़ुशी हासिल करने का सबसे उपयुक्त सादन होता है- दान।
जी हाँ, दान भी एक तरह की पूजा है। लेकिन जैसे कुछ समय पर पूजा करने से वह व्यर्थ चली जाती है। ऐसे ही दान देना भी हर समय उचित नहीं होता है। जी हाँ, दान देना हर समय ठीक नहीं होता है, किसी-किसी समय दान देना व्यर्थ होता है। आज हम आपको यही बताने जा रहे हैं कि किस समय दान देना व्यर्थ होता है।
शर्तों पर दान देनाः
आजकल शर्तों पर दान देने की परम्परा ख़ूब फल फूल रही है। जी हाँ, इसी तरह का एक दान है दहेज। आपको बता दें कि दहेज को इसीलिए सामाजिक बुराई माना जाता है, क्योंकि वह पहले से शर्त में बँधा हुआ दान होता है, कि हम आपको इतना देंगे, उतना देंगे आदि-आदि। कहने का मतलब साफ है कि कभी भी शर्तों में बँधकर दान नहीं देता है। ऐसा किया गया दान पूरी तरह से व्यर्थ माना जाता है।
आभार के लिए दान देनाः
कुछ लोग समाज में ऐसे भी हैं, जो दान इसलिए करते हैं, क्योंकि समाज उन्हें आभार व्यक्त करे यानी कि समाज उनका आभारी बन जाये। जी हाँ, यदि आप भी इस तरह से या इस विचार के साथ दान कर रहे हैं कि लोग आपकी जय-जयकार करें, तो फिर रहने दीजिए आपका किया हुआ दान व्यर्थ होगा।
Author: Amit Rajpoot
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