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मानसिक ग़ुलामी एक अभिशाप है। इसीलिए भगवान बुद्ध कहते हैं कि आज़ाद हो जाओ। जी हाँ, भगवान बुद्ध ग़ुलामी के किसी भी पक्ष में नहीं हैं। वो कहते हैं कि न तो किसी के ग़ुलाम बनों और न ही किसी को ग़ुलाम बनाओ। आज़ाद जिओ और आज़ादी से जीने दो। सभी को जीने की इच्छा है इसलिए सभी को स्वतंत्र होकर जीने दो। समझने वाली बात यह है, कि जो लोग शारीरिक ग़ुलाम हैं, लेकिन वह मानसिक रूप से आज़ाद हैं तो ऐसे लोग एक न एक दिन अपनी शारीरिक ग़ुलामी को समाप्त कर आज़ाद हो ही जाएँगे। लेकिन जो लोग मानसिक रूप से ग़ुलाम हैं, उनके हाथों में जंज़ीर भले ही न हो लेकिन वह लेकिन आज़ाद होकर भी वह ग़ुलाम ही रहेंगे। कहने का आशय बड़ा ही स्पष्ट है कि शारीरिक ग़ुलामी से मानसिक ग़ुलामी अधिक ख़तरनाक है।
इसीलिए भगवान बुद्ध मानसिक विकास पर बहुत अधिक ध्यान देते थे। वह चाहते थे कि सभी का मानसिक विकास हो, ताकि वह उन सभी चीज़ों को समझ सकें जिसने उन्हें ग़ुलाम बनाया हुआ है और उन्हें पता भी नहीं है कि वह ग़ुलामी किये जा रहे हैं। एक छोटा सा बच्चा जब इस दुनिया में आता है तो वह स्वतंत्र होता है। उसमें न लोभ होता है, न काम की उत्कंठा होती है, न वह क्रोध करता है, मोह भी उसे किसी चीज़ का नहीं होता है। वह बालक हर तरह की जिज्ञासाओं से मुक्त होता है, इसीलिए से किसी भी चीज़ का मोह नहीं होता है और न ही किसी चीज़ के लोभ और अहंकार से वह घिरा होता है।
आपको बता दें कि ऐसे लोग जो उस बालक की तरह होते हैं वह न तो किसी भविष्य का चिन्ता करते हैं और न ही किसी अतीत पर अभिमान और न ही घृणा। ऐसे लोगों को किसी भी चीज़ का डर नहीं होता है, वह अपने अस्तित्व में ही जीते हैं, न कि किसी आडंबर में। लेकिन हम ही तो हैं, जो उसे मानसिक रूप से धीरे-धीरे ग़ुलाम बना देते हैं।
Author: Amit Rajpoot
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