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बुद्ध कहते हैं कि मनुष्य की इच्छाएँ उसके दुःख का कारण होती हैं। लेकिन इच्छआएँ क्या होती हैं और ये कहाँ से आती हैं। आपको बता दें कि मनुष्य के शरीर की सभी इन्द्रियाँ कोई न कोई विशेषता और विशिष्ट इच्छा ज़रूर रखती है। ऐसे में यह सभी इन्द्रियाँ मिलकर मनुष्य के भीतर इच्छाएँ पैदा करती हैं। जैसे आँखें देखने का काम करती हैं। ऐसे में यदि कोई बहुत सुन्दर आपको दिख जाये तो आपकी आँखें बार-बार उसे देखने का मन करती हैं। ऐसे ही आपका हाथ उसे बार-बार छूने का मन भी करेगा। ऐसे में शरीर की सारी इन्द्रियाँ मिलकर आपमें एक प्रबल इच्छा पैदा करती हैं कि आप वह आप लें। आपके पास वह होना ही चाहिए और अगर आप उसे पा लेते हैं तो आपकी इन्द्रिय तत्काल संतुष्ट हो जाएगी।
लेकिन आपको बता दें कि यदि आपने एक बार अपनी इन्द्रिय को संतुष्ट कर दिया तो फिर समझिए कि आपकी इन्द्रिय बार-बार संतुष्ट होना चाहेगी। जी हाँ, इन्द्रियों को चारा खिलाने से इनकी भूख और भी ज़्यादा बढ़ती है। वास्तव में हमने जब से इस धरती पर जन्म लिया है तब से लेकर जब तक कि हम मृत्यु को नहीं प्राप्त कर लेते हैं तब तक हमारी इच्छाएँ खत्म ही नहीं होगीं। लेकिन अगर हम अपनी इन इन्द्रियजन्य इच्छाओं को सही से नहीं समझ सकते हैं, तो फिर ये हमारे दुःख का कारण भी बनती हैं।
इसलिए इच्छाओं के मायाजाल से निकलने का सबसे बेहतर तरीक़ा यही है कि आप अपने भीतर किसी भी चीज़ को लेकर कम से कम आसक्ति को जगह दें। जी हाँ, आसक्ति हमें पतित करती है, क्योंकि हम अपनी इच्छाओं के वशीभूत होकर उन्हें पूरी करने के लिए लगातार दुःखी बने रहते हैं। हम अपनी इच्छाओं के पूरा न होने पर दुःखी हो जाते हैं। इतना ही नहीं, हमें जो मिला है उसे भी खो देने के भय से हम भयभीत होते हैं। इसलिए हमें इच्छाओं के मायाजाल से निकलने के लिए कम से कम ज़रूरतें पैदा करनी होगी।
Author: Amit Rajpoot
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