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मृत्यु एक सपाट और धवल सच है, लेकिन ज़्यादातर लोग इसे स्याह समझते हैं। यही कारण है कि योगियों और परम् ज्ञानियों को छोड़कर हममें से लगभग सभी लोग मृत्यु डरते हैं। ऐसे लोग जो मृत्यु से डरकर रहते हैं, वह हर पल यह सोचते हैं कि मृत्यु उनके क़रीब है और फिर इस डर से लोग भय के मारे जीवन को भी ख़ुलकर नहीं जीते हैं। हालाँकि यह सच है कि एक न एक दिन मृत्यु सभी की आनी है और मज़े की बात तो यह कि किसी को भी नहीं पता है कि उसकी मृत्यु कब आनी है। बावजूद इसके वो भयभीत होते हैं। संभव है कि इसका कारण यह है कि लोगों को पता ही नहीं है कि आख़िर मृत्यु क्यों आती है। तो चलिए, आज हम इसी की बात करते हैं कि आख़िर मृत्यु क्यों आती है।
वास्तव में ज़्यादातर लोग जीवन को उपहार समझते हैं और मृत्यु को समझते हैं अभिषाप, जबकि आपको बता दें कि मृत्यु ही सबसे बड़ा उपहार होता है। मृत्यु ही तो है जो हमें जागरण का अनुभव कराती है। तनिक फर्ज़ कीजिये कि मृत्यु की आहट महसूस होते ही व्यक्ति जीवन को समझने लगता है, यानी कि उसका चैतन्य जागरण होता है। सच तो यह है कि यदि इंसान की मृत्यु न आये तो वो हमेशा-हमेशा के लिए अँधेरे में ही घूमता रह जाये और कभी भी प्रकाश की ओर बढ़ने की सोचेगा ही नहीं। इसलिए मृत्यु को जीवन से अधिक आवश्यक माना जाता है।
आपको बता दें कि वास्तव में मृत्यु जीवन को पूर्णता प्रदान करने के लिए आती है। जी हाँ, जीवन को लंबा या अधिक जी लेना कोई बहुत बड़ी बहादुरी नहीं है, बल्कि वाजित तो वह है जो जीवन को हर रोज़ पूर्णता के साथ और जागृत होकर जिया जाये। ऐसे में जब आप जीवन को पूर्ण जागृत होकर जीकर अपने जीवन को सुरक्षित करेंगे तो मृत्यु को सत्य के साथ महसूस करके उसका उत्सव मनाएँगे।
Author: Amit Rajpoot
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