Forgot your password?

Enter the email address for your account and we'll send you a verification to reset your password.

Your email address
Your new password
Cancel
समय के साथ भले ही हमारे सामाजिक परिवेश में बदलाव आ रहा है, लेकिन अभी भी हमारे समाज में ट्रांसजेंडर सुमदाय की स्थिति बेहतर नहीं हुई है। आलम ये है कि आज भी इस वर्ग के अधिकांश लोग जीवन व्यापन के लिए देहव्यापार से लेकर भीख मांगने को मजबूर हैं... हां लेकिन इन्ही में कुछ विरले ऐसे भी हैं, जिन्होने परिस्थितियों से समझौता ना करते हुए संघर्ष की राह चुनी और सफलता की नई इबारत लिखी। आज हम आपको एक ऐसे ही शख्स के बारे में बताने जा रहे हैं जिसने ना सिर्फ अपने संघर्ष से अपनी तकदीर बदल डाली बल्कि अपने वर्ग के बाकी लोगों के लिए भी नई राहें बनाई।
इस शख्स का नाम है सुमी दास। पश्चिम बंगाल की रहने वाली सूमी दास, कभी पेट भरने के लिए सिर्फ पचास रुपये में अपना शरीर जलपाईगुड़ी स्टेशन पर बेचा करती थीं। लेकिन फिर इनकी अंधेरी दुनिया में शिक्षा की रोशनी ने उजाला भरा और ये बन बैठी लोक अदालत की जज । चलिए सूमी के संघर्ष और जीवनयात्रा के बारे में आपको विस्तार से बताते हैं।
दरअसल, सुमी बताती हैं कि उनका जन्म एक लड़के के शरीर में हुआ था। पर जब उन्होने होश संभाला तो उन्हें लड़की होने का अहसास होने लगा। उनके हाव-भाव, बोलने के अंदाज से लेकर शारीर में परिवर्तन आने लगे, जिसके कारण वो स्कूल से लेकर आसपास में उपेक्षा का शिकार होने लगी। हालांकि सुमी के मुताबिक अकेली संतान होने के नाते उन्हे माता-पिता का भरपूर प्यार मिलता था, पर धीरे-धीरे जब उन्हे भी लगने लगा कि सुमी बाकि बच्चों से अलग हैं तो घर-परिवार में भी परिस्थितियां यूं बदली कि 14 साल की उम्र में सुमी को अपना घर छोड़ पड़ा।
घर छोड़ने के बाद सुमी के आगे सबसे बड़ा सवाल पेट भरने का था, ऐसे में वो अपने सुमदाय के बाकी लोगों के जैसे देहव्यापार के रास्ते पर चल पड़ी। सुमी कहती हैं कि तभी मेरी सुंदरता में कोई कमी नहीं थी, ऐसे में लोग मेरी ओर आकर्षित होते थे और मैं भी लड़कियों जैसे सजती-संवर कर समाज के लोगों के साथ जलपाईगुड़ी स्टेशन जाने लगी। वहां सिर्फ 50 रुपये में खुद को दूसरों के हवाले कर देती थी। ऐसे में इससे पेट की भूख को मिटने लगी पर फिर मुझे एहसास हुआ कि पेट की भुख तो खत्म भले ही हो जारी है, पर मुझे सम्मान की जो भूख लगी थी, उसे कैसे मिटाऊं।
ऐसे में जब खुद के सम्मान के लिए सुमी में चेतना जागी तो वो एक एनजीओ के साथ जुड़ गई, जिसमें वो एचआइवी प्रोजेक्ट के तहत काम करने लगी, वहीं सुमी का काम कंडोम बांटना था। इस काम के जरिए धीरे धीरे सुमी में उस वर्ग विशेष के बीच पहचान मिलने लगी और लोग उन्हें कंडोम मौसी के नाम से ही पुकारने लगे।
इसके बाद सुमी में शिक्षा प्राप्त करने के ललक जगी तो इन्हे किसी के जरिए इग्नू के बारे में पता चला, जिसके बाद उन्होने अपना पंजीकरण करा लिया। इग्नू से सुमीने पुस्तकालय विज्ञान से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। शिक्षा के साथ ही सुमी में अपन समाज के लिए बेहतर करने की इच्छा बलवंत हुई और ट्रांसजेंडर को सम्मान दिलाने के लिए आंदोलन से जुड़ गई। उन्होने मोइट्रि संजोग सोसायटी की स्थापना की और इसके जरिए ट्रांसजेंडर्स को अंग्रेजी बोलने से लेकर उनको कुटीर उद्योग का प्रशिक्षण देने का इंतजाम किया। सुमी के मेहनत का नतीजा ये हुआ आज तकरीबन उनके संस्था से प्रशिक्षण प्राप्त कर निकले डेढ़ दर्जन ट्रांसजेंडर नौकरी और व्यसाय कर सम्मान के साथ जीवनयापन कर रहे हैं।
यहीं नहीं ये सुमी की मेहनत, लगन और समाज के प्रति उनका समर्पण का ही परिणाम है कि उन्हें लोक अदालत का जज बनाकर सम्मान दिया गया है। आज सुमी सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही नहीं पूरे देश में ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए मिसाल बनकर उभर चुकी हैं। वहीं सुमी अपने इस जीवनयात्रा से लोगों को रूबरू कराने के लिए एक फिल्म बना रही हैं। ताकी उनकी कहानी समाज के हर हिस्से तक पहुंच सके और इससे जितना हो सके ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रति लोगों की सोच में बदलाव आए।
ऐसी रोचक और अनोखी न्यूज़ स्टोरीज़ के लिए गूगल स्टोर से डाउनलोड करें Lopscoop एप, वो भी फ़्री में और कमाएं ढेरों कैश वो भी आसानी से
Author: Yashodhara Virodai
YOUR REACTION
  • 0
  • 9
  • 3
  • 0
  • 0
  • 1

Add you Response

  • Please add your comment.