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बात तक़रीबन 18 साल पुरानी है। महाराष्ट्र के सांगली गाँव में सेना के एक जवान की दोनों किडनियाँ फेल हो गयी थीं। उस जवान को जीवित रहने के लिए कम से कम एक किडनी की ज़रूरत थी, लेकिन उस जवान के रिश्तेदारों और घर वालों समेत किसी ने भी उसको अपनी एक किडनी देना मुनासिब नहीं समझा। तभी उसी गाँव के रहने वाले प्रमोद लक्ष्मण महाजन ने हिम्मत दिखाई और सेना के उस जवान को अपनी एक किडनी देने का फ़ैसला किया। प्रमोद लक्ष्मण महाजन के किडनी दान देने के बाद वह जवान बहुत जल्द स्वस्थ होकर सामान्य ज़िन्दगी बिताने लगा।
सेना के उस जवान की ज़िन्दगी को फिर से गुलज़ार देखकर प्रमोद लक्ष्मण महाजन को इतनी ख़ुशी मिली कि उन्होंने इसके बाद अंगदान के प्रति लोगों को जागरुक करने का अनोखा रास्ता अपनाया। उन्होंने तय किया कि वह भारत में घूम-घूमकर लोगों को अपनी कहानी बताएँगे और प्रेरित करेंगे कि मरणोपरान्त या फिर जीवित रहते हुये ही लोग अपने अंगों का दान करें ताकि दूसरे की ज़िन्दगी को सँवारा और उपयोगी बनाया जा सके। प्रमोद लक्ष्मण महाजन महाराष्ट्र के सांगली गाँव से निकलकर ऐसा करने लगे।
हैरानी की बात है कि प्रमोद लक्ष्मण महाजन ने यह तय किया कि वह 100 दिनों में 10 हज़ार किलोमीटर मोटरसाइकिल चलाकर लोगों को अंगदान के प्रति जागरुक करने का अभियान लेकर निकलने का काम करेंगे। उन्होंने ऐसा ही किया और भारत के महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश और बिहार समेत कई राज्यों में अंगदान के प्रति जन जागरुकता फैलाई।
आपको बता दें कि 70 साल की अवस्था में प्रमोद लक्ष्मण महाजन के लिए यह काम कोई सरल नहीं था। इस दौरान इन्हें संवाद के लिए भाषायी अड़चनें भी आयीं, लेकिन हौसले बुलंद हों तो फिर भला कोई अड़चन क्या कर सकती है। मन और भाव की भाषा से प्रमोद लक्ष्मण महाजन ने लोगों को संवाद किया और हज़ारों लोगों को अंगदान करने की शपथ भी दिलायी। ऐसे प्रेरणादायी विभूतियों की समाज को बहुत ज़रूरत है।
Author: Amit Rajpoot
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