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सृष्टि की रचना कैसे हुयी है और इसका नियन्ता यानी कि इसे नियंत्रण में रखने वाला कौन है, इस बात का प्रश्न एक बेहद विवेक और दर्शन वाला है। हममे से ज़्यादातर लोग ईश्वर को ही इस सृष्टि का नियन्ता मानने हैं, जबकि ऐसा नहीं है। जी हाँ, क्योंकि किसी भी चीज़ का दूरदर्शी निष्कर्ष केवल मनुष्य ही निकाल सकता है। यानी कि बड़ा स्पष्ट है कि दूर का निर्णय निकालने की योग्यता सिर्फ़ मनुष्य में ही है। अतीत और भविष्य को वर्तमान के केंद्र पर एकजुट करने की क्षमता के कारण मनुष्य सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी सिद्ध हुआ है। मनुष्य ही तो है जो हाथी, घोड़े, बैल और भैंस जैसे बलवान जीवों को अपने नियंत्रण में रखने लगा।
बहरहाल, आपको बता दें कि धर्म का परायण करने वाला ही इस सृष्टि का नियंता है और दूर तलक सोचने समझने और उसके अनुसार आचरण करने की क्षमता का नाम ही तो धर्म है। इसमें तत्वदर्शन भी आता है और संस्कृतिक आचार-विचार भी। ग़ौरतलब है कि ये सवाल भी अहम है कि सृष्टि क्या है? इसे किसने बनाया और इसका रहस्य क्या है? मनुष्य क्या है, मृत्यु के बाद वह कहाँ जाता है आदि दार्शनिक जिज्ञासाएँ और उनकी जानकारियां भी धर्म का अंग हैं।
धर्म का दार्शनिक विवेचन करें तो बुद्धि का समुचित उपयोग करना भी धर्म है। बुद्धि का उपयोग करना न आता होता तो मनुष्य की विचार क्षमताएं पशुवत हो जातीं हैं और वह अपने बारे में भी सही निर्णय नहीं ले सकता। जब तक मनुष्य बुद्धि और विवेक की शक्ति की महत्ता समझता रहा, उसका उपयोग करता रहा तब तक संसार बड़ा सुखी रहा। धीरे-धीरे वह ज्ञान की अपेक्षा पदार्थ में अधिक सुख अनुभव करने लगा। उसे दूरवर्ती परिणाम सोचने में मुश्किलें होने लगीं। यही वजह है कि तात्कालिक सुखों की स्पर्धा में मनुष्य सुख ढूढ़ने लगा और पदार्थों की जड़ता के बंधन में पड़ने लगा।
कहने को आज का संसार बहुत चतुर और बुद्धिशील है, पर वह दुखी और अशांत भी उतना ही है। इसका कारण अपनी बुद्धि का दूरदर्शी उपयोग ना करना ही था। मनुष्य अपनी बुद्धि और विवेक का उचित प्रयोग कर अपनी और सृष्टि की नियति तय कर सकता है। इस प्रकार मनुष्य ही इस सृष्टि का असल नियन्ता माना जाता है।
Author: Amit Rajpoot
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