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Buddha ने मानव के कल्याण के लिए हर छोटी से छोटी चीज़ पर ध्यान दिया है। इसमें से एक है मनुष्य के द्वारा हर क़दम पर की जाने वाली ग़लती। ग़लती एक ऐसा दुर्गुण है, जिससे हरर इंसान लिप्त रहता है। जीवन में कभी न कभी ऐसा पड़ाव ज़रूर आता है जब इंसान ग़लती कर बैठता है। बुद्ध कहते हैं कि ग़लती करना मनुष्य का स्वाभाविक लक्षण है, इसमें कोई दोष नहीं है। लेकिन ग़लती का एहसास न करना पाप है। इसलिए ग़लती का एहसास हर मनुष्य को ज़रूर करना चाहिए। आइए आज हम आपको एक कथा के माध्यम से यह बताने की कोशिश करते हैं, कि इंसान के लिए ग़लती का एहसास करना क्यों ज़रूरी होता है।
प्राचीन समय की बात है महात्मा बुध वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे। पूर्णिमा की रात थी। प्रकाशमान चंद्रमा की रंगत देखते ही बन रही थी। तभी पास के गांव में से कुछ मनचले युवक एक स्त्री का अपहरण कर उसी ओर से गुजरे जहां तथागत विश्राम कर रहे थे। आगे जाकर उन युवकों ने उस स्त्री के वस्त्र भी छीन लिए। वे सब शराब के नशे में मदहोश होकर नाच कूद रहे थे। उनको बेहोश हुआ देखकर स्त्री वहां से भाग निकली। युवकों को जब बड़ा थोड़ा होश आया, तो देखा कि वह जिसके लिए नाच रहे थे वह उनके बीच नहीं है।
अब युवक तुरंत उसे खोजने निकले, लेकिन रात को जंगल में उसे खोज पाना उनके लिए बहुत मुश्किल था। फिर भी वे बदमाश उस वृक्ष के पास आ पहुंचे, जहां महात्मा बुद्ध विश्राम कर रहे थे। उन युवकों ने आपस में मंत्रणा की कि यही तो जाने का एक रास्ता है। ऐसे मे वह स्त्री यहां से जरूरी है गुजरी होगी। उन्होंने बुद्ध से कहा कि सुनो भिक्षु! यहां से कोई सुंदर युवती भागती हुई निकली है क्या? तुमने उसे देखा है? बुद्ध ने उत्तर दिया- कोई निकला जरूर है। लेकिन यह कहना मुश्किल है और व्याख्या करने की मेरी कोई इच्छा नहीं है कि वह स्त्री थई या पुरुष। युवक थोड़ी देर असमंजस में सोचते रहे। फिर उन्हें अपनी आसक्ति की गलती का एहसास हुआ और वह बुद्ध से क्षमा मांग कर अपने रास्ते चले गए।
Author: Amit Rajpoot
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