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आज पुरे विश्व में अलग अलग धर्म मिलते है जो वास्तव में अलग अलग संप्रदाय है। जब इस धरती पर सतयुग था तब इस पूरी धरती पर केवल एक ही धर्म था और उस धर्म का कोई नाम नहीं था इसलिए उसे सनातन कहा गया। सनातन का अर्थ होता है जो हमेशा रहता है और जिसका मूल स्वरूप कभी बदलता नहीं है।
ऐसी ही स्थिति लगभग त्रेतायुग में बनी रही परंतु द्वापरयुग का अंत आते आते इस पृथ्वी मानो अलग अलग धर्मो की बाढ़ सी आ गई। इसका मूल कारण तो कलियुग ही है जो सबको आपस में लड़ा रहा है परंतु इस विषय में एक कथा भी शिवपुराण में मिलती है।
यह कथा त्रिपुरासुर के अंत से जुडी है। कथा के अनुसार तारकासुर के तीन पुत्र जो बड़े शिवभक्त थे वह अन्तरिक्ष में अलग अलग सोने, चांदी और लोहे के अलग अलग नगरों में रहते थे और वह तीनो के तीनो बड़े शिवभक्त थे। वह सभी वरदान से बलवान बने हुए थे और देवताओं को कष्ट देते थे।जब सभी देवता शिवजी से यह प्राथना करने गए कि आप उन तीन असुरों का वध करे क्योंकि वह तीनो सृष्टि के कार्य में दखल दे रहे है तो शिवजी ने उन देवताओं से कहा वह तीनो मेरे परमभक्त है और जब तक वह मेरी भक्ति करेंगे में उन्हें नहीं मारूंगा। आप लोग भगवान विष्णु की शरण में जाइए। वह ही आप की सहायता करेंगे।
उसके बाद सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गए और भगवान विष्णु से यह प्राथना की कि वह तारकासुर के पुत्रों को शिवभक्ति से विमुख कर दे। जब सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गए तो भगवान विष्णु ने सृष्टि की रक्षा के लिए उन्हें ऐसा करने का वचन दे दिया और फिर भगवान विष्णु अलग अलग रूप धारण करके अन्तरिक्ष में फिर रहे उन तीनो नगरों में गए। वहां जाकर भगवान विष्णु ने लोगों को ज्ञान देने लगे। भगवान विष्णु उन नगर में रहने वाले लोगों को जो ज्ञान दे रहे थे वह ज्ञान लोगों को शिवभक्ति से दूर करने वाला था। भगवान विष्णु ने उन नगर में रहनेवालों को कहा शिव का रूप तो अमंगल है। आप उस क्यों इश्वर मानते है। वास्तव में इश्वर का तो कोई रूप होता ही नहीं, वह तो निराकार होते है।
भगवान विष्णु की बातों में तारकासुर के तीनो पुत्र आ गए और उन्होने भगवान शिव की भक्ति छोड़ दी। वैसे भगवान विष्णु ने जो बात उन्हें बताई थी वह गलत नहीं थी क्योंकि भगवान विष्णु ने वहा पर इश्वर के साकार स्वरूप की नहीं परंतु इश्वर के निराकार स्वरूप की पूजा का लोगों को उपदेश दिया। वास्तव में शिव ही साकार भी है और पुरे संसार में व्याप्त वहीँ इश्वर निराकार भी है।
उसके बाद सभी देवताओं ने पशुभाव को अपने मन में धारण किया और विश्वकर्मा ने शिवजी के लिए रथ का निर्माण किया, ब्रह्मा शिवजी के सारथि बने और भगवान विष्णु शिवजी के धनुष और बाण बने। उसके पश्चात एक बाण से शिवजी ने तारकासुर के तीनो पुत्रों के नगरों को एक साथ नष्ट कर दिया। उस समय जिसने शिव की भक्ति करनी नहीं छोड़ी थी वहीँ जीवित बचा , बाकी सभी असुर उस तीनों नगरों के साथ नष्ट हो गए।
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