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हमारे शब्दों के चयन पर ही किसी भी व्यक्ति का व्यक्तित्व तय होता है और इसी पर निर्भर होती है उसके व्यक्तित्व की पहचान। वास्तव में आजकल राजनीतिक बहसों का दौर है। आरोप प्रत्यारोप का जमाना है। वादों का शोर और खंडन का महादौर चल रहा है। लेकिन इन सबके बीच हमारे शब्द कहां है? यह पड़ताल का विषय है। हमारे शब्दों से संस्कार क्यों गायब हो रहे हैं? क्या कभी किसी ने इस तरफ भी विचार किया है? आपको बता दें कि आरोप के शब्दों की भी एक गरिमा होती है और प्रशंसा के शब्दों के भी संस्कार होते हैं। लेकिन लगता है कि हम इतने राजनीतिक होते जा रहे हैं, कि सब भूलते जा रहे हैं। कम से कम मीडिया की खबरों में नेताओं के शब्दों से तो यही झलकता है।
वास्तव में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हिंदू शास्त्रों में शब्दों के चयन पर बहुत जोर दिया गया है। शब्द कहे, लिखे और बोले जाते हैं। यानी कि शब्दों के उच्चारण मात्र में ही इन विशेषणों का प्रयोग होता है। यह शब्द ही है, जो व्यक्तित्व की पहचान बनते हैं। यह शब्द ही हैं, जो संबंधों को जोड़ते हैं और समाप्त भी कर देते हैं। संबंध से संसार बनता है, क्योंकि संसार का प्रत्येक जीव आपस में एक-दूसरे से जुड़ा और एक दूसरे पर निर्भर भी रहता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि शब्द कहीं प्रवचन कहे जाते हैं, तो कहीं भाषण क्योंकि प्रवचन में बोले गए शब्द जीव कल्याण और जनहित का भाव रखते हैं, तो भाषण में स्वार्थ पूर्ति निहित होती है।
शब्द कभी-कभी बिना उच्चारण के भी बहुत गंभीर संकेत दे जाते हैं- जैसे हंसने में केवल हा हा, लेकिन वहां भी अट्टहास या व्यंग्यात्मक शैली में परिभाषित होते हैं। यानी हंसी अपने आप में ही कहीं अहंकार तो कहीं विनम्रता प्रदर्शित करती है। पहले गुरुकुल की व्यवस्था थी जहां गुरु शब्दों के अर्थ और उनका प्रयोग कहां कैसे और कब करना है बताते थे और माता-पिता संतान को व्यवहारिक ज्ञान उपलब्ध कराते थे।
Author: Amit Rajpoot
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