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बुद्ध के क़िस्सों ने प्राणियों के व्यवहार में परिवर्तन कर दिया है। इसलिए आज हम बुद्ध का एक क़िस्सा साझा करने जा रहे हैं। हुआ यूँ कि एक बार भगवान बुद्ध का उपदेश सुनने के लिए बहुत से लोग आए हुए थे। प्रवचन के समय उनके शिष्य आनंद ने पूछा- भंते! आपके सामने हजारों की संख्या में लोग बैठे हैं। बताइए इनमे सबसे सुखी कौन? बुद्ध ने कहा- वह देखो! सबसे पीछे दुबला सा फटे हाल जो आदमी बैठा है, वह सबसे अधिक सुखी है। यह सुनकर आनंद की समस्या का समाधान नहीं हुआ। उसने पुनः प्रश्न किया। यह कैसे हो सकता है?
बुद्ध ने आनंद की ओर देखा और बोला- अच्छा अभी बताता हूं। उन्होंने बारी-बारी से अपने सामने बैठे लोगों से पूछा। तुम्हें क्या चाहिए? किसी ने धन मांगा, किसी ने संतान, किसी ने बीमारी से मुक्ति मांगी, तो किसी ने अपने दुश्मन पर विजय मांगी, किसी ने मुकदमे में जीत की प्रार्थना की। वहां पर एक भी आदमी ऐसा नहीं निकला, जिसने कुछ ना कुछ मांगा न हो।
अंत में उस आदमी की बारी आई। बुद्ध ने उससे पूछा- कहो भाई! तुम्हें क्या चाहिए? उस आदमी ने कहा, कुछ भी नहीं। अगर भगवान को कुछ देना ही है, तो बस इतना कर दें कि मेरे अंदर कभी कोई चाह ही पैदा ना हो। ऐसे में ही अपने को बड़ा सुखी मानता हूं। तब उसने आनंद से कहा- सुनों आनंद! जहां चाह होती है, वहां मनुष्य कभी सुखी नहीं हो सकता है। इसलिए हमेशा व्यक्ति को निःस्वार्थ और बिना आसक्ति के बिना चाह के जीवन जीना चाहिए, तभी वो सबसे अधिक सुखी जीवन व्यतीत कर सकता है।
Author: Amit Rajpoot
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