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फ्रेडरिक इरिना ब्रूनिंग जब पहली बार जर्मनी से भारत घूमने के उद्देश्य आई थीं, तब वह महज 20 साल की थीं। उस वक्त उनकी योजना थी कि भारत समेत एशिया के दूसरे देशों का भ्रमण करेंगे और वापस जर्मनी लौट जाएंगे। ऐसा जर्मनी ही नहीं बल्कि यूरोप के अधिकतर युवा करते हैं। दुनियादारी समझने के लिए दुनिया घूमने का यह तरीका वहां बहुत आम है। लेकिन हिंदुस्तान इरिना ब्रूनिंग को इस कदर भाया कि वह यहां की होकर रह गईं। उन्हें भारत के आध्यात्मिक माहौल ने काफी प्रभावित किया। मथुरा के आश्रमों में पूजा पाठ करते हुए उनके दिन बीतने लगे और इस तरह वह ब्रज की संस्कृति में पूरी तरह रम गई। उन्होंने अपना नाम भी ब्रूनिंग की जगह सुदेवी दासी रख लिया। दिलचस्प है कि वह अब पद्मश्री सुदेवी दासी हो गयी हैं, क्योकि सरकार ने उन्हें भारत के इस सम्मान से नवाजा है।
उनके पिता जर्मनी के एक बड़े अधिकारी रहे हैं। वह दिल्ली के जर्मन दूतावास में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। ब्रूनिंग बताती हैं कि मुझमें गौ-सेवा के संस्कार कहीं न कहीं उनकी वजह से भी है, क्योंकि वह भी मथुरा आते रहते थे। ब्रज में रहना हो और गायों से लगाओ ना हो ऐसा सामान्यता नहीं पाया जाता। तो इस पवित्र पशुओं के प्रति मेरा प्रेम बहुत स्वाभाविक सा था। एक दिन ब्रज भ्रमण के दौरान मैंने सड़क किनारे एक बछड़े को तड़पते देखा। मुझे उसकी हालत देखकर बहुत तकलीफ हुई। शायद उसी दिन से मेरे जीवन के मकसद को बदल कर रख दिया। मैंने सिर्फ उसका इलाज के लिए सहारा बीमार गोवंश की सेवा करने का संकल्प गायों के प्रति मेरा लगाओ प्रेम में बदल गया और मैंने गाय पालने शुरू कर दी।
आपको बता दें कि ब्रूनिंग भले ही भारत में स्थाई रूप से रह रही हैं, लेकिन उनके काम पर इसका कोई असर नहीं पड़ता है, क्योंकि उन्होंने इंतजाम कर के पास के एक गांव में जमीन खरीदकर राधा सुरभि गौशाला का निर्माण कराया। इस गोशाला में फिलहाल 1400 से अधिक गोवंश हैं। इनमें से आधे से ज्यादा गोवंश घायल एवं बीमार है, जिनका गोशाला में उपचार किया जा रहा है। बीमार और घायल को लाने के लिए उन्होंने 2 एंबुलेंस का भी इंतजाम किया हुआ है।
Author: Amit Rajpoot
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