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यह यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जिसने अपने पोते निखिल को पैसे और चरित्र के बारे में बताया। आइए आपको सीधे कहानी से जोड़ते हैं। निखिल ने अपने दादा जी से पूछा- पैसे से सब कुछ खरीदा जा सकता है न? दादा जी मुस्कुराते हुए बोले, बेटा पैसों से हम जरूरतों की पूर्ति तो कर सकते हैं, पर अपना चरित्र नहीं बदल सकते। निखिल ने कहा, दादा जी मैं कुछ समझा नहीं। दादाजी उसे एक कहानी सुनाने लगे। होटल में ठहरी एक महिला ने अपने बच्चे के लिए मैनेजर से दूध मंगा। उस मैनेजर ने इसके लिए महिला से ₹100 लिए। वापसी के रास्ते में वह महिला चाय की एक छोटी सी दुकान पर रुकी और चाय वाले से बोतल में बच्चे के लिए दूध लिया। महिला ने उससे पैसे पूछा तो चाय वाले ने बोला, मैं बच्चों के दूध के पैसे नहीं लेता। आपको और दूध चाहिए तो ले सकती हैं। लौटते हुए महिला सोचने लगी, होटल का मैनेजर रोज़ हजारों रुपए कमाता है फिर भी एक गिलास दूध के उसने ₹100 ले लिए। दूसरी ओर चाय वाला रोज शायद ₹1000 भी न कमाता हो और बच्चे के दूध के लिए उसने पैसे नहीं लिए।
निखिल हैरानी से उन्हें देखे जा रहा था। दादाजी ने कहा, मैं तुम्हें एक और कहानी सुनाता हूं। कुछ दिनों पहले मैं अपने दर्जी के यहां सूट की नाप देने गया था। वहां एक बड़ी सी चमचमाती गाड़ी से एक महिला उतरी और दर्जी से बोली- भैया कोई सस्ता सा सूट दिखाना। मुझे अपने नौकर के बेटे की शादी में देना है। कुछ ही देर बाद जब महिला चली गई तो एक दूसरी महिला आई। शायद किसी घर में झाड़ू पोछे का काम करती थी। वह महिला दर्जी से बोली- भाई साहब मुझे कोई अच्छा सा महंगा सूट दिखाना मुझे अपनी मालकिन के बेटे की शादी पर देना है।
ये कहानी सुनाकर निखिल से दादा जी बोले- शायद अब तुम समझ पाओगे कि पैसे और चरित्र का क्या रिश्ता है निखिल। वास्तव में पैसा आने के बाद हम अक्सर अपने चरित्र को भूल जाते हैं।
Author: Amit Rajpoot
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