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देवदास गोस्वामी के पिता फौज में ड्राइवर थे। आजादी से पहले शुरू हुई उनकी नौकरी 1982 में खत्म हुई। रिटायरमेंट के वक्त उनको ₹300 महीने की तनख्वाह मिलती थी। पांच भाई-बहन सहित सात लोगों के परिवार का पेट भरने के लिए यह रकम उस दौर में भी नाकाफी थी। घर के ऐसे माहौल में देवदास को पढ़ाई-लिखाई से दूर कर दिया गया और वह हाई स्कूल भी पास नहीं कर सके। चूंकि पिता ड्राइवर थे, इसलिए उनकी इच्छा भी ड्राइवर बनने की हुई। मगर उनके पिता को यह गवारा नहीं था, कि उनका बेटा भी गाड़ी चलाएं। उन्हें उनके शराबी बनने की आशंका थी, जो कि इस लाइन में ज्यादा स्वाभाविक ही था। बाप बेटे की असहमति के बीच देवदास गोस्वामी ने घर छोड़ने का फैसला किया, लेकिन जाते-जाते उन्होंने अपने पिता से शराब को ताउम्र हाथ ना लगाने का वचन दिया।
देवदास गोस्वामी एक ट्रक से सफर पर थे और रास्ते में उन्होंने देखा कि एक मरा हुआ कुत्ता सड़क पर पड़ा है और गाड़ियां उसकी लाश को बार-बार कुचल रही हैं। देवदास गोस्वामी को यह दृश्य परेशान कर गया था। उन्होंने ड्राइवर से अपनी परेशानी साझा की। ड्राइवर ने उनकी मदद तो की नहीं, उल्टा उन्हें मारपीट कर गाड़ी से उतार दिया। इसके बाद भूखा और बेचैन देवदास कई किलोमीटर पैदल चला। बिना किसी मंजिल के रेलगाड़ियों से यात्राएं की। फिर उन्होंने अपनी मेहनत के दम पर ट्रक ड्राइवर बनने की ठानी और वह बन भी गये।
संघर्ष के अपने दिनों के बारे में गोस्वामी बताते हैं कि “मैंने सड़क पर मरे हुए जानवरों को हटाने का काम जारी रखा। इसके लिए कई लोगों ने मुझे पागल तक समझ लिया था। मैं करीब 3 साल बाद घर लौटा और मेरी शादी हुई। मुझे लगता था कि जीवों के प्रति मैं ही संवेदनशील हूं लेकिन मेरी पत्नी तो इस मामले में मुझसे भी ज्यादा जुनूनी निकली। उसने परोपकार के प्रत्येक काम में कंधे से कंधा मिलाकर मेरा साथ दिया। सड़कों पर कई दफा अनजान लोगों की लाशें भी पड़ी मिलती हैं। मैं उनके क्रिया कर्म का भी इंतजाम करता हूं। इसके लिए मैंने एक एंबुलेंस की भी व्यवस्था की है। लोगों को आश्चर्य होता है कि लावारिस लाशों को कंधा देने का काम मेरे साथ मेरी पत्नी भी करती है। हम मिलकर अब तक ढाई सौ से ज्यादा लाशों को कंधा दे चुके हैं।” आपको बता दें कि देवदास गोस्वामी मूलतः हरियाणा के गनौर शहर के रहने वाले हैं और दिल्ली में रहकर काम कर रहे हैं।
Author: Amit Rajpoot
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