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प्रयागराज को तीर्थराज यानी की सभी तीर्थों का राजा कहा जाता है। आपने तो यह भी जरूर सुना होगा कि माघ मकर गति रवि जब होई, तीरथपति आव सब कोई। यानी कि जब सूर्य मकर राशि में अपनी गति करता है। तब सारे तीर्थ जो भी दुनिया में हैं। वह सब प्रयागराज पहुंच जाते हैं। इसके पीछे की कहानी क्या है, इसके बारे में जानने की कोशिश करते हैं। इससे पहले आपको बता दें कि माघ मास को आलोक मास भी कहा जाता है। इस विशिष्ट साधना काल में आने वाले हर पर्व के रूप-रंग निराले और अनोखे हैं। स्नान दान का यह काल विशेष संयम और त्याग के दिव्य भाव जगाने की शुभ प्रेरणा देता है।
वैदिक साहित्य में उल्लेख है कि हमारे ऋषि मनीषी इस महीने में विभिन्न साधनाएं करते हैं। रामायण काल में तीर्थराज प्रयाग में महर्षि भारद्वाज का आश्रम साधना और तप का एक ऐसा अनन्य केन्द्र था, जहां जिज्ञासु साधक एकत्रित होकर संगम तट पर तप करते थे। आज भी माघ मास में प्रयाग की पुण्य भूमि में कल्पवास के लिए जुड़ते हैं। कुंभ पर्व की रौनक देखते ही बनती है। इस महीने की प्रत्येक तिथि पवित्र मानी जाती है, लेकिन मौनी अमावस्या माघ मास का प्रमुख पर्व है। इसके अलावा बसंत पंचमी और महाशिवरात्रि जैसे विशेष प्रमुख पर्व इस तीर्थ में होते हैं।
ग़ौरतलब है कि हाल ही में बसंत पंचमी का महापर्व निकल चुका है। इसके बाद अब अंतिम 4 मार्च को महाशिवरात्रि का पर्व आएगा, जिसमें लाखों करोड़ों श्रद्धालु गंगा में डुबकी लगाएंगे। माघ मास में तीर्थराज प्रयाग में त्रिवेणी स्नान का विशेष महत्व माना गया है। मान्यता है कि विद्याधर और गौतम ऋषि द्वारा अभिशप्त इंद्र को भी माघ स्नान से ही मुक्ति मिली थी। आज नदिया बुरी तरह प्रदूषित हो रही हैं। सूख रही हैं, फिर भी आस्था तो देखिए। प्रयागराज में पुण्य अर्जित करने हर कोई स्नान पर्व पर बड़ी संख्या में उमड़ रहा है।
Author: Amit Rajpoot
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