Forgot your password?

Enter the email address for your account and we'll send you a verification to reset your password.

Your email address
Your new password
Cancel
शंकराचार्य के अनुसार तमाम दुनियावी चीजें या तो भ्रम हैं या हमारे बौद्धिक ज्ञान पर आधारित सच। ब्रह्म अर्थात ईश्वर आत्मा चेतना के आदि शाश्वत सत्य हैं। असल में शंकराचार्य ने इस ओर बड़ा कीम किया है। भारत के प्रमुख तीर्थ स्थानों की यात्रा के समय के आचार्यों और विद्वानों से भेंट के अलावा श्रीमद्भागवत गीता ब्रह्म सूत्र और 12 उपनिषद ग्रंथों पर टीका ग्रंथों के लिए भी आदिशंकराचार्य को जाना जाता है। उनकी तीन रचनाएं प्रमुख है- दक्षिणामूर्ति स्तोत्र, गोविंदाष्टक और सौंदर्य लहरी। शून्यवाद और निराकार ब्रह्म की चर्चा करते हुए शंकराचार्य ने 12 ज्योतिर्लिंग, 18 शक्तिपीठ और चारों धामों की यात्रा की तथा भारत की आत्मा को तलाशने का काम किया। शंकराचार्य ने भारत भूमि तथा संस्कृति को एक सूत्र में जोड़ा। उस दौर में गुप्त साम्राज्य का पतन हो रहा था और मुस्लिम साम्राज्य की दक्षिण एशिया में जीत हो रही थी। कन्नौज के शासक हर्षवर्धन की मृत्यु हो चुकी थी। नर्मदा के दोनों किनारों पर राष्ट्रकूट साम्राज्य का बोलबाला था, जिसका उत्तर में प्रतिहारों, पूर्व में पाल और दक्षिण में चोलों से लगातार संघर्ष चल रहा था।
उस वक्त तक क्षेत्रीय भाषाएं और लिपियां जो आज के दौर में चल रही है, नहीं थीं। उस दौर में जयदेव के गीत गोविंद की रचना नहीं की गई थी, जिसने पहली बार दुनिया को कृष्ण की राधा से परिचित कराया। उस दौर में शंकराचार्य ने पूरे भारतवर्ष का भ्रमण करते हुए हर जगह सिर्फ एक ही भाषा संस्कृत में संवाद किया, जो उच्च बौद्धिक वर्ग को जोड़ती थी।
शंकराचार्य साधारण सन्यासी नहीं थे, बल्कि स्थापित मान्यताओं को नकारने वाले क्रांतिकारी थे। जब उन्हें अपनी मां का अंतिम संस्कार करने की इजाजत ना मिली तो उन्होंने अपने घर के पिछले हिस्से में उनका अंतिम संस्कार अपना वादा निभाया। उन्होंने पूरे भारत में चारों दिशाओं में मठ स्थापित किए। आदिगुरू शंकराचार्य इस दुनिया के बारे में अपने अनुभव से बताते हैं कि यह संसार भ्रम है या बौद्धिक ज्ञान पर आधारित सच है।
Author: Amit Rajpoot
YOUR REACTION
  • 0
  • 0
  • 0
  • 0
  • 0
  • 0

Add you Response

  • Please add your comment.