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स्टोरी के सिलसिले में रुचिरा गुप्ता नेपाल के एक गांव में थीं। वहां की लड़कियां एक बनी बनाई व्यवस्था के तहत मुंबई की बदनाम गलियों में भेज दी जाती थीं। मानव तस्करी का काम लंबे समय से अनवरत जारी था, जिसमें काम आते थे गांव के कुछ लालची लोग, भ्रष्ट सीमा प्रहरी और तमाम आपराधिक रवैया वाले लोग। इस नई जानकारी से पहले रुचिरा गुप्ता ने पत्रकारिता करते हुए युद्ध किया। महिला और गरीबी जैसे मुद्दों को कवर किया। लेकिन ऐसी कोई रिपोर्ट उनके लिए बिल्कुल नई बात थी। रुचिरा गुप्ता ने बंगाल और दिल्ली के नामी मीडिया संस्थानों में काम किया है। इस दौरान उन्होंने अल्पसंख्यकों के मुद्दों और पूर्वोत्तर भारत की जरूरतों पर खूब लिखा।
उन्होंने नेपाल की उस त्रासदी स्थिति को डॉक्यूमेंट्री के जरिए दिखाने की कोशिश की। द स्पेलिंग ऑफ इनोसेंस नामक उस फिल्म के लिए उन्हें पुरस्कार भी मिला। लेकिन पता नहीं क्यों वह पुरस्कार लेकर रुचिरा गुप्ता को मजा नहीं आया, क्योंकि फिल्म देख कर लोग भावुक तो हो रहे थे, पर उन बच्चियों की सुरक्षा का कोई बंदोबस्त हुआ नहीं, जो कि उनका मुख्य उद्देश्य था।
असम के उस गांव की घटना ने रुचिरा को दोबारा पत्रकारिता में वापस आने से रोक दिया और उन्होंने यह क्षेत्र छोड़कर ‘अपने आप’ नाम से एक संस्था की स्थापना की। संस्था की स्थापना के पीछे उनका प्राथमिक उद्देश्य था, कि वह अपने सहयोगियों की मदद से इन बदनाम गलियों में जाकर वहां रह रही महिलाओं से बात करेंगी। उन्हें अपनी संस्था से जुड़ने का प्रस्ताव भेजेंगी और यदि हां करती हैं, तो उन्हें बकायदा परिचय पत्र देकर अपने दफ्तर आने को कहेंगी। सब कुछ योजना के मुताबिक हुआ।
जब औरतें रुचिरा गुप्ता के संगठन से जुड़ने लगीं, तो उन्होंने उनकी समस्याओं और उनकी इच्छाओं पर बात कीवो महिलाएँ सशक्त हुयीं और अपनी बेटियों को भी उस दलदल से निकालने की कोशिश शुरू कर दीं। लेकिन सब कुछ इतनी आसानी से होने वाला नहीं था। इसके लिए उन प्रताड़ित महिलाओं ने रुचिरा के माध्यम से की कानूनी मदद ली। 16 साल से भी ज्यादा समय से रुचिरा गुप्ता की संस्था ऐसी ही महिलाओं की मदद कर रही है। उन्होंने इन महिलाओं की बच्चियों की शिक्षा के लिए भी काम किया है।
Author: Amit Rajpoot
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