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एम नारायणमूर्ति साल 1959 में भारतीय सेना से जुड़े हुए थे। जैसा कि आपको पता है कि सैनिकों का काम दुश्मनों को मारना ही नहीं होता, बल्कि अपनों को बचाना भी होता है। यह नारायण मूर्ति की खुशकिस्मती रही है कि उन्होंने शुरू से ही दूसरों को मारने के बजाए अपनों को बचाया ज्यादा है। उन्हें देश के कई अहम ऑपरेशनों में शामिल होने का मौका मिला। साल 1961 में गोवा को आजादी दिलाने में और 1962 में भारत चीन युद्ध में उन्हें अपनी सेवाएं देने का अवसर मिला। साल 1974 में सेना से रिटायर हुए तो भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (तत्कालीन अंतर्राष्ट्रीय विमान प्राधिकरण) से जुड़ गए। वहां 1974 से 1980 तक काम किया।
कहते हैं ना कि हर आदमी को अपने जीवन की उपयोगिता साबित करने के लिए एक नहीं, बल्कि कई मौके मिलते हैं। ऐसा ही एक मौका नारायण मूर्ति को भी साल 1990 में फिर मिला। नागरिक उड्डयन के इतिहास में पहली बार एक लाख से ज्यादा भारतीयों को संकट से सुरक्षित बाहर निकालने का प्रयास अंजाम दिया जाना था और वह इस ऑपरेशन के लिए सुरक्षा प्रभारी के रूप में जमीन पर काम कर रहे थे। कुवैत की सफलता ने नारायण मूर्ति को अद्भुत शांति प्रदान की।
अब जबकि नारायण मूर्ति की उम्र 83 साल से ज्यादा की हो चुकी है, भले ही वह युद्ध के मैदान में लड़ने लायक वह नहीं बचे हैं, लेकिन उनके भीतर का फौलाद अभी भी ज़िन्दा है और उनकी लड़ाई भी जारी है। दिलचस्प है कि नारायण यातायात और उसके नियमों के प्रति लोगों के लापरवाह रवैए के खिलाफ कहते हैं कि “मैं बेंगलुरु की सड़कों के यातायात को बेहतर करने की दिशा में काम कर रहा हूं। ये ज्यादातर लोगों को एक छोटी सी बात लग रही है, लेकिन हमारी दिनचर्या की गलती किसी की जिंदगी तक निगल सकती है। मैं कोशिश में हूं कि अपनी मुहिम को सड़कों के साथ स्कूल कॉलेजों तक ले जाऊं।”
Author: Amit Rajpoot
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