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"मैं अंदर गई थी तो वहां टॉयलेट की दीवारों पर कुछ लिखा था। मुझे उसका मतलब नहीं पता पापा। आप बताइए ना, उसका क्या मतलब होता है?" यह वह सवाल है जो उत्तम सिन्हा की 8 साल की मासूम बेटी ने अपने पिता से बार-बार पूछे थे। यह सवाल वो अपने पिता से बार-बार दोहरा रही थी। इसके बाद से उत्तम सिन्हा हर बार उसके सवालों को किसी न किसी बहाने से डाले जा रहे थे। उनके पास अपनी बेटी के सवालों का कोई जवाब नहीं था। लेकिन उनकी बच्ची की जिज्ञासा शांत नहीं हुई, बड़ी मुश्किल से उत्तम सिन्हा ने किसी तरह स्थिति संभाली और लिखावट को ‘गंदी बात’ कहकर बेटी को दूसरी बातों में उलझाया। इस दौरान उत्तम सिन्हा अंदर से बिल्कुल बौखला गये और तुरंत ही एक गीला कपड़ा लेकर ट्रेन के शौचालय में लिखे शब्दों को मिटाया।
इस वाकये को एक साल से ज्यादा का वक्त हो गया है। इस घटना के बाद उन्होंने तय कर लिया कि सार्वजनिक स्थलों पर उन्हें ऐसी गंदी बातें लिखी मिलेंगी तो वह उन्हें मिटाएंगे। तब से स्कूल, कॉलेजों, सरकारी इमारतों और अन्य जगहों पर जहाँ भी ऐसी हरकत सिन्हा को दिखाई पड़ती है, वह उसे मिटाने के लिए तुरन्त आगे आते हैं। इतना ही नहीं, वह वहां पर एक पोस्टर चिपकाते हैं जिस पर लिखा होता है- “स्टॉप राइटिंग, शौचालय का प्रयोग आपकी मां-बहन भी करेंगी।”
उत्तम सिन्हा की लगातार कोशिशों का ही नतीजा है की आज धनबाद से गुजरने वाली कई ट्रेनों में उनका काम स्पष्ट और साफ तौर पर दिख जाता है। समाज में ऐसी कुंठित मानसिकता वालों की कमी नहीं है, जो अपनी मानसिक बीमारी के कारण सार्वजनिक स्थलों पर ऐसी करतूत को अंजाम देते हैं। इनकी हरकतों से संबंधित महिलाओं और लड़कियों की मानसिक मनोदशा पर विपरीत असर पड़ता है। ऐसा नहीं है कि इस सामाजिक बुराई का अंदाजा उत्तम सिन्हा पहले नहीं कर पाए थे, लेकिन उनकी मासूम बेटी के सवालों ने उन्हें इसके खिलाफ लड़ाई छेड़ने को मजबूर कर दिया। इसीलिए अपनी मुहिम के लिए उत्तम सिन्हा सबसे ज्यादा अपनी बेटी को धन्यवाद देते हैं, क्योंकि उसी के सवालों की वजह से यह बदलाव आया।
Author: Amit Rajpoot
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