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हीरे की कीमत एक जौहरी ही समझता है... ये कहावत जितनी आम है उतनी ही सच्ची भी। क्योंकि दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हे अपनी काबिलियत के बारे में पता ही नहीं होता, पर जब कोई दूसरा शख्श उनकी काबिलियत को पहचान अगर बढ़ावा दे तो फिर वो ऐसा कर गुजर जाते हैं, जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता । आज हम आपके सामने ऐसी ही बेहद प्रेरणादायी कहानी लेकर आए हैं। दरअसल, हम बात कर रहे हैं मध्यप्रदेश का सर्वोच्च शिखर सम्मान हासिल करने वाली चित्रकार भूरी बाई की, जिनकी दिहाड़ी मजदूर से मशहूर चित्रकार बनने की कहानी बेहद दिलचस्प है। जी हां, असल में ये कहानी है भोपाल में रहने वाली महिला मजदूर की है, जिस पर एक दिन पड़ी एक आर्टिस्ट की नजर और वो बन गई वर्ल्डफेमस पेंटर। तो चलिए आपको भूरी बाई से मिलवाते हैं।
दरअसल, आज भूरी बाई जिस मुकाम पर हैं वहां पहुंचने का सपना भी उन्होंने कभी नहीं देखा था, पर एक दिन इनकी जिंदगी की दशा और दिसा दोनो बदल दी। दरअसल, गुजरात के तेजगढ़ गांव की रहने वाली भील समुदाय की भूरी बाई ने चित्र बनाने की प्रेरणा तो घर-परिवार और आसपास के माहौल से ली। पर उनके घर में ना कला के लिए माहौल था और ना ही रंग और कैनवस खरीदने के पैस। घर में दो वक्त का खाना भी बड़ी मुश्किल से मिलता था। ऐसे में 10 साल की उम्र से ही भूरी भी मजदूरी करने लगी और 17 साल की उम्र में शादी के बाद भी ये स्थिति नहीं बदली। हां पर शादी के बाद वो रोजी रोटी की तलाश में वो पति के साथ भोपाल पहुंची, जहां नियति ने उनके लिए कुछ और ही योजना बना रखी थी।
साल 2012 में पति और बच्चों के साथ भूरी मजदूरी करने भोपाल पहंची थीं, जहां उन्हे भारत भवन में चल रहे निर्माण कार्य में रेत-गारा उठाने का काम मिला। यहीं एक दिन खाली समय में भूरी चूने से फर्श पर कुछ अटपटे चित्र बना रही थी, तभी एक व्यक्ति की नजर इन चित्रों पर पड़ी और उसने भरी से उन चित्रों के बारे में पूछते उन्हे कैनवास पर बनाने को कहा। वैसे भूरी ने उस वक्त तक कैनवास कभी देखा नहीं था, पर फिर भी उन्होने कोशिश की। भूरी के बनाए वो चित्र उस व्यक्ति को पसंद आए और उसने हर दिन 6 रूपए दिहाड़ी पाने वाली भूरी को प्रति दिन चित्र बनाने के लिए 10 रूपए के मेहनताने की पेशकश की।
ऐसे में शुरू हुई भूरी की चित्रकारी और उन्होने चित्रों की एक श्रृंख्ला तैयार कर दी, जिसके बाद उन चित्रों के माध्यम से उन्हे जनजाति संग्राहालय की दीवारों को पेंट करने का मौका मिला। इतना सब हो जाने के बाद भूरी को पता चला कि जिस व्यक्ति ने उनक कला हो पहचाना वो और कोई नहीं बल्कि प्रसिद्ध चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन थें। उन्होंने भूरी की पिथौरा कला को जनजाति संग्राहालय की दीवारों तक पहुंचाया और इन दीवारों ने भूरी को अंतराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धी दिलवायी।
इसके बाद भूरी को भारत भवन में चित्र बनाने के का भी मौका मिला, जहां दस चित्र के बदले उन्हें 1500 रुपए मिले। हालंकि इधर भूरी की जिंदगी में कला के रंग भर रहे थें, उधर उनके पति को लोग तरह-तरह की बात कह लोग भड़काने लगे। जिसके बाद उनका पेंटिंग बनाना छूट गया और फिर उन्होने पीडब्ल्यूडी में भी मजदूरी की, कई सालों तक। पर एक दिन जब उनके पति के किसी जानने वाले ने उन्हे बताया कि तुम्हारी पत्नी भूरी का अखबार में फोटो आया है और सरकार उसे शिखर सम्मान देगी। तब जाकर पति और उनके परिवार वालों को उनके हुनर की कद्र हुई।
इसके बाद भूरी बाई ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और आज उनकी पेंटिंग की कीमत लाखों में है। भूरू बताती हैं, कि कोलकाता के एक कलाप्रेमी ने उनकी एक पेंटिंग डेढ़ लाख में खरीदी है। वहीं उनको अमेरिका में फोकआर्ट मार्केट के लिए भी बुलाया गया, जहां दुनियाभर के कलाप्रेमियों ने उनके चित्रों की सरहाना की। भूरी को उनकी कला के लिए मध्यप्रदेश का सर्वोच्च शिखर सम्मान, अहिल्या सम्मान और 2009 में रानी दुर्गावती सम्मान समेत कई कला पुरस्कार मिल चुके हैं।
Author: Yashodhara Virodai
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