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ऐसा मत करो, ऐसा करो। इधर आओ, इधर मत आओ। इस तरह की लिस्ट बच्चे की उम्र बढ़ने के साथ-साथ बढ़ती जाती है, क्योंकि अभिभावक बच्चे को सुरक्षित देखना चाहते हैं। आगे बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन हमें यह समझना होगा कि हर बात में टोकना कितना सही है। कहीं आप की हिदायतें बच्चों के लिए बंधन तो नहीं बनती जा रही हैं। हममें से बहुत कम अभिभावक ऐसे हैं, जो कि बच्चों की इन समस्याओं के बारे में विचार करते हैं या सोचते हैं। वह बेरोक-टोक बच्चों को रोकते-टोकते ही रहते हैं। उनके हर छोटे-बड़े काम पर उन्हें हर कदम पर रोक देते हैं। ऐसे में बच्चा भी मानसिक रुप से अलग सा दबाव महसूस करने लगता है, जो उसको धीरे-धीरे कुंठा का शिकार बना देता है।
जी हां, आपको बता दें कि आपका विश्वास और कड़ी मेहनत असफलता नामक बीमारी को मारने के लिए सबसे बेहतर दवाई है। यह आपको एक सफल व्यक्ति बनाती है। इसके अलावा अगर आपका आत्मविश्वास ही मर गया, तो फिर आप जिंदगी में कुछ भी नहीं कर सकते हैं और ना ही कभी बड़ा सोचने का सपना ही सोच सकते हैं। यह दमन माता-पिता ही अपने बच्चे में धीरे-धीरे रोकने-टोकने की आदत से ही भर देते हैं। इसलिए ऐसा बिल्कुल भी ना करें।
आपको बता दें कि जो कल तक बच्चे थे वो अब बड़े और शादीशुदा होकर अपने निर्णय खुद से करने लगते हैं और उनकी अपनी पहचान भी समाज में बनने लगती है। मगर कुछ मा- बाप तो उन्हें अपनी पहचान के साथ जीना ही मुश्किल कर देते हैं। गौरतलब है कि माता-पिता की अपने जवान बच्चों के जीवन में दखलअंदाजी इस हद तक बढ़ गई है, कि झगड़े और अनबन की स्थिति पैदा हो जाती है। मतभेद इतने बढ़ जाते हैं कि या तो अभिभावक मानसिक बीमारी का शिकार हो जाते हैं या फिर बच्चे अवसाद की गिरफ्त में आ जाते हैं।
क्या खाना है, क्या पीना है, कहां जाना है, क्या करना है, क्या नहीं करना है यह सब माता-पिता ही तय करते हैं। इसका सीधा असर बच्चों के व्यक्तित्व पर पड़ता है। उनका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है। बचपन तक तो ठीक है मगर बड़े बच्चों पर अपनी पसंद ना पसंद थोपना मां-बाप के लिए ही नहीं, बच्चों के भविष्य के लिए भी हानिकारक है। एक तो बच्चों के मन में यह बात बैठ जाती है कि आखिर फैसला माता-पिता को ही करना है, तो फिर वह क्यों अपना दिमाग लगाएं। इसका परिणाम यह होता है कि बच्चा अपने लिए अनुकूल निर्णय नहीं ले पाता है।
Author: Amit Rajpoot
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