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भगवान बुद्ध एक बार एक नगर में उपदेश दे रहे थे। वहाँ से भगवान बुद्ध ने अपने उपदेश समाप्त किया और उठकर जाने लगे। तभी उपदेश सुन रहे स्रोताओं में से एक सज्जन ने उठकर औचक ही बुद्ध से सवाल किया- हे बुद्ध! मेरा एक प्रश्व है। उम्मीद है कि आप मुझे आप यह बताएंगे कि क्या इस दुनिया में भगवान है या नहीं? बुद्ध ने कहा- कोई काम का प्रश्न पूछ लो। वह व्यक्ति बोला- हे बुद्ध! कैसी बात कर रहे हो। क्या यह काम का प्रश्न नहीं है? बुद्ध ने कहा- इस दुनिया में ईश्वर के होने या न होने से संबंधित जो भी प्रश्न हैं, वह सभी प्रश्व व्यर्थ हैं। वह व्यक्ति चुपचाप खड़ा रह गया और बुद्ध अपने आश्रम की और प्रस्थान कर गये।
हालांकि वह व्यक्ति यहीं नहीं रुका। अगले दिन बुद्ध के आश्रम में वह व्यक्ति फिर पहुँचा और उसने बुद्ध से दोबारा पूछा- हे बुद्ध! कल आप मुझे संतुष्ट किये बगैर चले गये हैं, लिहाजा आज भी मेरा वही प्रश्व है कि क्या इस दुनिया में ईश्वर है या नहीं है? आपने बहुत दिनों तक तपस्या की है, इसलिए आपको इस प्रश्व का जवाब अवश्य मालूम होगा। इसलिए आप कृपया मेरे इस प्रश्व का समाधान करें।
बुद्ध मुस्कुराए और बोले- तुम आस्तिक हो या नास्तिक? उस व्यक्ति ने बताया कि मैं आस्तिक हूँ। ईश्वर में मेरा विस्वास है। तब बुद्ध बोले- तुम कौन से ईश्वर को मानते हो? व्यक्ति बोला- मैं अपने कुल देवता को मानता हूँ, जिसे मेरे पिता, उससे पहले उनके पिता और उससे भी पहले उनके पिता मानते रहे हैं। बुद्ध ने पूछा- तुम्हें इस ईश्वर या देवता का बोध किसने कराया?
वह व्यक्ति बोला- मेरे पिता ने ही मेरा बोध कराया है और कई संतों से भी मैंने इसकी पुष्टि की है। बुद्ध बोले- तुमने ईश्वर का बोध कभी नहीं किया है। तुम बस मान लेना चाहते हो कि कोई कह दे कि ईश्वर है, हालांकि तुम ख़ुद को आस्तिक कहते हो जबकि तुम्हें इस बात का संदेह है कि ईश्वर है या नहीं? इसलिए तुम स्वयं ईश्वर का बोध करो कि ईश्वर है। यदि तुम्हें ईश्वर समझ में आये तो ईश्वर है और न समझ में आये तो ईश्वर नहीं है।
Author: Amit Rajpoot
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