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कश्मीर के राजा एक हिन्दू शासक महाराजा हरि सिंह को सभी जानते हैं, जिन्होंने भारतीय रियासतों के विलय के समय पाकिस्तान और भारत में से किसी के भी साथ जाने के पक्ष में नहीं थे। हालांकि कश्मीर पर पाकिस्तानी सेना के हमले के बाद उन्होंने भारत से मदद मांगकर हमेशा के लिए इसके संरक्षण में ही रहने का फ़ैसला किया। ऐसे में यूँ तो सभी कश्मीरी हिन्दुओं और वहां के साम्राज्य से बाख़ूबी वाक़िफ़ हैं, लेकिन आज हम आपको कश्मीर के इस्लामिक इतिहास से रू-ब-रू कराने जा रहे हैं। आपको बता दें कि भारत के भीतर यानी कि कश्मीर में भे इस्लाम ने 14वीं शताब्दी में अतिक्रमण करना शुरू कर दिया। कश्मीर में कुरान की सबसे पहली प्रति 1237 ईस्वी की प्राप्त होती है। इसे इस्लामिक स्कॉलर फ़तेह उल्लाह द्वारा तैयार किया गया था।
कश्मीर में पहला मुस्लिम मिशनरी सैय्यद शराफ-उद-दीन अब्दुर रहमान सुहरावर्दी उर्फ बुलबुल शाह था। लौहार वंश के राजा सुहदेव (1301-20) के शासनकाल के दौरान एक बड़े पैमाने पर यात्रा करने वाले इस्लामी उपदेशक कश्मीर आए थे। इनमें बुलबुल शाह भी थे। इसने कश्मीर में सुहदेव के उत्तराधिकारी रिनचाना को प्रभावित कर इस्लाम कबूल करने के लिए तैयार कर लिया और उसे सुल्तान सदरुद्दीन शाह के नाम से जाना जाने लगा। वह कश्मीर का पहला मुस्लिम शासक था।
रिनचाना के धर्मपरिवर्तन के बाद उसका साला और सेनापति रावणचंद्र ने भी इस्लाम स्वीकार कर लिया। रिनचाना के बाद 1339 में कश्मीर के सिंहासन पर शाहमीर काबिज हुआ और उसके बाद शाहमीर वंश का प्रारम्भ हुआ। इसके बाद कुछ परंपराओं की मानें तो दस हजार कश्मीरियों को इस्लाम स्वीकार करने के लिए मानसिक व भौतिक रूप से तैयार किया गया। ऐसे में राजकीय संरक्षण मिलने से कश्मीर में इस्लाम के बीज बोए दिए गए। कश्मीरियों के बीच इस्लाम का प्रसार करने के लिए अन्य सैय्यदों के एक मेजबान के रूप आगमन से बढ़ा। इनमें से सैय्यद जलाल-उद-दीन, सैय्यद ताज-उद-दीन और सैय्यद हुसैन सिमनानी प्रमुख थे।
हालांकि, सबसे बड़ा मिशनरी हमदान (फारस) के मीर सैय्यद अली हमदानी था, जिसने कश्मीर में इस्लाम के प्रसार में सबसे असाधारण रूप से बढ़ाया। जिन्हें शाह-ए-हमादान के रूप में भी जाना जाता है। वह सूफियों के कुबरवी सिलसिले से था और 700 शिष्यों और सहायकों के साथ कश्मीर आया। उसका जोर शाही परिवार के इस्लामीकरण और न्यायाधिकरणों (कंटकशोधन और धर्मस्थायी) के इस्लामीकरण पर था। इसके बाद उसने आम लोगों के धर्म परिर्वतन में सत्ता और न्यायाधिकरणों का उपयोग किया। उसके शिष्य सैयद अली इस महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने का बीड़ा उठाया था। उसके बाद उसके शिष्यों ने इसे जारी रखा।
इस धोखाधड़ी से चैदहवीं शताब्दी तक कश्मीरी जनता का सबसे बड़ा धर्म बन गया। मीर सैय्यद अली हमदानी का कश्मीर में प्रभाव केवल धर्म तक ही सीमित नहीं था, बल्कि कश्मीर की संस्कृति, उद्योग और अर्थव्यवस्था पर बहुत पड़ा। अब वे शॉल बनाने, कालीन निर्माण, कपड़ा बुनाई आदि के नए कामों में लग गए। इससे पूर्व कश्मीर विश्व का प्रमुख व्यापार केन्द्र और व्यवसायिक राजधानी था। अब कश्मीर उत्पादन केन्द्र बन गया।
Author: Amit Rajpoot
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