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कश्मीर को आज लोग या तो हिन्दू के नज़रिये से देखते हैं या फिर बतौर एक मुसलमान के नज़रिए से। कोई उस हिन्दुओं की थाती कहता है, तो कोई कश्मीर को मुसलमानों को जागीर ने बैठा है। इन सबका कारण और हवाला यह हा कि कश्मीर में अलग-अलग समय में अलग-अलग शासकों का साम्रज्य क़ायम था। लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि कश्मीर में ग़ैर-हिन्दू और ग़ैर मुसलमान शासन भी रहा है। चलिए, आज हम आपसे उन्हीं साम्रज्यों के बारे में चर्चा करते हैं, जिसमें न तो कहीं हिन्दुओं का लाल निशान नज़र आता है और न कहीं मुस्लिमों की हरी चाहर। इन दोनों के अलावा वहां सिख और डोगरा शासन भी रह चुका है।
सिख साम्राज्यः
1819 में कश्मीर महाराजा रणजीत सिंह के सिख साम्राज्य के अधीन आ गया। कश्मीर पर सिख शासन 1846 तक 27 वर्षों तक चला। इन 27 वर्षों के सिख शासन ने कश्मीर में 10 राज्यपालों को देखा। इन 10 गवर्नरों में से पांच हिंदू थे, तीन सिख थे और दो मुस्लिम थे। इस तथ्य के कारण कि कश्मीरी अफगान शासकों के अधीन थे, उन्होंने शुरू में सिख शासन का स्वागत किया। सिखों ने राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के कारण कश्मीर की केंद्रीय मस्जिद, जामा मस्जिद को 20 साल के लिए बंद कर दिया गया और अजान जारी करने से रोक लगा दी। सिख शासन के दौरान कश्मीर में यूरोपीय पर्यटक आने लगे। सिखों ने सुब्राओ की लड़ाई में कश्मीर पर अपना अधिकार खो दिया और 1846 में कश्मीर ब्रिटिश गर्वनर द्वारा हिंदू डोगरा महाराज गुलाब सिंह को सौंप दिया गया।
डोगरा शासनः
100 साल का डोगरा शासन में अंग्रेज कश्मीर घाटी के लोगों के लिए आपदा बन गया। वाल्टर लॉरेंस ने घाटी के किसानों की स्थितियों को हताशपूर्ण बताया और यह उल्लेख किया कि घाटी के किसानों ने अंग्रेजों को अपने दुखों को जिम्मेदार ठहराया। लॉरेंस ने विशेष रूप से उन राज्य अधिकारियों की आलोचना की जो कश्मीरी पंडित समुदाय के थे, लेकिन अंग्रेज सत्ता और उसके दबाव को इसका जिम्मेदार माना। कश्मीर में 1877-79 के बीच अकाल पड़ा था और इस अकाल से मरने वालों की संख्या किसी भी मानकों से अधिक थी। कुछ अधिकारियों ने सुझाव दिया कि श्रीनगर की आबादी आधी से कम हो गई है जबकि अन्य ने घाटी की पूरी आबादी के तीन-पांचवें हिस्से तक कम होने का अनुमान लगाया है।
Author: Amit Rajpoot
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