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एक बार एक व्यक्ति गौतम बुद्ध से पूछता है कि हे बुद्ध! कर्म क्या है? बुद्ध मुस्कुराते हैं और कहते हैं कि मैं तुम्हें एक छोटी सी कहानी सुनाता हूँ। एक बार एक राजा अपने ही राज्य में अपने मंत्री के साथ लकड़ी की एक दुकान के सामने से गुजर रहे होते हैं। राजा का यह अनुभव है कि जब भी वह इस दुकान के सामने से गुजरता है तो उसके भीतर से यह आवाज़ आती है, कि उसे उस दुकानदार को दंडित करना चाहिए। हालांकि राजा को नहीं मालूम होता है, कि वह उस दुकानदार के साथ ऐसा क्यों करना चाहते हैं, जबकि राजा जब भी उसकी दुकान के सामने से गुजरता है तो उसे यही भाव आता है कि वह उस दुकानदार को दंडित करे।
इस बात को राजा अपने मंत्री से कहता है। मंत्री कहता है कि हम इस समस्या का कोई न कोई ज़रूर निकाल लेते हैं कि आख़िर आप इस दुकानदार को ठीक ढंग से न जानने के बाद भी ऐसा क्यों महसूस करते हैं। इसके बाद दोनों वापस महल चले जाते हैं और राजा इस बात को कमोबेश भूल जाता है, लेकिन मंत्री इस बात की अभी भी गाँठ बाँधे हुये है।
इस समस्या का कारण खोजने के लिए मंत्री भेष बदलकर बाज़ार जाता है और उस दुकानदार के पास जाकर कहता है कि भाई और बताओ धंधे-पानी के क्या हाल है? इस बात पर दुकानदार कहता है कि भाई क्या बतेँ आजकल लकड़ियां लोग मेरी दुकान से ले नहीं जा रहे हैं. लोग आते हैं और लकड़ियों की तारीफ करते हैं, लेकिन कोई ख़रीदता नहीं है। अब तो एक ही सहारा है कि यहां का राजा मर जाये तो उसका मंत्री मेरे पास ही लकड़ियां ख़रीदने आये।
मंत्री बोला- अरे भाई कुछ लकड़ियां हमें भी दो, मुझे लकड़ी की ज़रूरत है। मंत्री उस दुकानदार के यहां से कुछ लकड़ियां ख़रीदकर राजा के सामने पेश होता है और कहता है कि महाराज! ये सुगंधित लकड़ियां आपके लिए उस दुकानदार ने उपहार में भेजी हैं। राजा की धारणा बदल गयी. वह उस राजा के प्रति कृतज्ञ हुआ और उसके लिए मंत्री से कुछ सोने की मोहरे भिजवायीं।
मोहरे पाकर दुकानदार हैरान रह गया। वह मन ही मन पछताता रहा कि राजा के बारे में उसके प्रति कैसे विचार हैं और राजा उसे मोहरे दे रहे हैं। तब बुद्ध ने उस दुकानदार को कहा कि कर्म सिर्फ़ क्रिया-कलापों से ही नहीं, बल्कि मन से भई होता है। इसलिए हे भन्ते! कर्म सिर्फ़ हाथ-पैरों का खेल नहीं है, यह इससे बाहर की भी चीज़ हैं। इसलिए यह मत सोचना कि मन से कर्म नहीं किया जाता है। वास्तव में कर्म करने से पहले उसे मन से स्वीकारना बहुत ही आवश्यक है।
Author: Amit Rajpoot
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