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कहते हैं कि जब बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति हुयी तो वह सात दिनों तक एकदम से शान्त थे। बुद्ध की यह शान्ति इतनी स्थिर, मधुर और रसपूर्ण थी कि उससे प्रज्ञा का पूरा का पूरा संसार सराबोर हो गया। वास्तव में बुद्ध की न तो बोलने को कोई इच्छा हुया और न ही ऐसा कोई बाव ही पैदा हुया कि वह कुछ बोलें। ऐसे में कहते हैं कि बुद्ध के इस मौन से यदि कहीं देवलोक होता होगा तो वह ज़रूर थरथराया होगा। ऐसा इसलिए भी था, क्योंकि हज़ारों हज़ार सालों की तपस्या के बाद भी लोग बुद्धत्व को प्राप्त नहीं हो पाते हैं। ऐसे में राजकुमार सिद्धार्थ का बुद्ध बन जाना कोई साधारण घटना नहीं थी। उनके बुद्ध हो जाने पर उपजे मौन से तीनों लोक में प्रभाव पड़ा और ब्रह्मा का सिंहासन तक डोल गया।
कहते हैं कि ब्रह्मा पूरे देवताओं के साथ भगवान हो चुके बुद्ध के सामने प्रगट हुये और सभी के साथ बुद्ध को शीश नवाया। आपको बता दें कि हमने बुद्धत्व को देवत्व से ऊपर रखा है, क्योंकि देवता भी बुद्धत्व को तरसते हैं। वह तो केवल स्वर्ग में सुखी हैं, लेकिन वह अमरत्व को प्राप्त नहीं हो सके हैं। यानी कि वह मोक्ष से दूर हैं।
बहरहाल, बुद्ध के मौन को तोड़ने के लिए ब्रह्मा उनके चरणों में झुके और बोले- हे बुद्ध! आप अपना मौत तोड़ दीजिये। आप नहीं बोलेंगे भारी दुर्घटना हो जायेगी और यदि आप अपना मौन नहीं तोड़ेंगे तो संसार की परम्परा बिगड़ जायेगी। आपके बोलने से अंधकार में पड़े लोगों को भला हो सकेगा और उन्हें प्रकाश का कोई न कोई मार्ग मिल सकेगा। वास्तव में बुद्ध के प्रवचनों से लोगों का भला हो सकेगा। इसलिए हे बुद्ध! आप बोलें। अंततः करुणावश बुद्ध बोले और पिर अपना पहला उपदेश दिया।
कहने का मतलब साफ है कि जब आप मौन हो जाते हैं, तो अस्तित्व भी प्रार्तना करते हैं कि आप बोलें। साधारण इंसान वासना से बोलता है और बुद्ध पुरुष करुणा से बोलता है। साधारण व्यक्ति इसलिए बोलता है कि कुछ मिल जाये, लेकिन बुद्ध पुरुष इसलिए बोलता है कि कुछ बँट जाये।
Author: Amit Rajpoot
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