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भक्ति भगवान की होती है और भगवान की भक्ति में ब्रह्मचर्य का क्या महत्व है यह सवाल योगी जनों का आम और अहम सवाल दोनों है। इसीलिए इसके जवाब के लिए भगवत् गीता के दूसरे अध्याय के 44वें श्लोक में भगवान कृष्ण उपदेश देते हैं कि हे अर्जुन! जो लोग भोग और विलासिता में बहुत ज़्यादा आसक्त हैं, उनकी बुद्धि और चेतना का हरण हो जाता है। ऐसे विचलित लोग भक्ति से विरक्त कभी भी समाधि की अवस्था को प्राप्त नहीं कर पाते हैं। हालांकि जो लोग सिर्फ़ ब्रह्मचर्य का ही पालन करते हैं, उन्हें पसाच फीसदी भगवत् प्राप्ति का मार्ग स्वयं ही प्रशस्त हो जाता है। ऐसे में हमें ब्रह्मचर्य और भक्ति में इसकी आवश्यकता के बारे में समझना बहुत ही आवश्यक है।
आपको बता दें कि भक्ति के मार्ग में ईश्वर या सत्य की प्राप्ति के लिए ब्रह्मचर्य का बड़ा महत्व होता है। इसके बग़ैर उसकी प्रप्ति नहीं हो सकती है, जबकि ब्रह्मचर्य के पालन मात्र से मनुष्य ईश्वर के समीप जाकर बैठ जाता है। उसकी चेतना अपने उच्चासन पर विराजमान हो जाती है। ग़ौरतलब है कि ब्रह्मचर्य का प्रयोग सिर्फ़ ग़ैर-शादीशुदा लोगों के लिए ही आवश्यक नहीं रहता है, अपितु यह जितना कुँवारे या ग़ैर-शादीशुदा लोगों के लिए ज़रूरी होता है उतना ही शादीशुदा लोगों के लिए भी ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक होता है। लेकिन आजकल का समाज पत्नी-पति के रूप में संसर्ग को संतान उत्पत्ति के अलावा मनोरंजन का साधन समझकर उसका भोग करता रहता है।
इसका परिणाम यह होगा कि ऐसे लोग थोक में नर्क-कुण्ड को भरेंगे। आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा इन पाँचों इन्द्रियों से हम जो कुछ भी ग्रहण करते हैं, उनको वश में करके हम ब्रह्मचर्य को प्राप्त कर सकते हैं। अन्यथा हम इनसे भोग की प्राप्ति करते जायेंगे तो ईश्वर हमसे उतना ही दूर जाता रहता है। इसलिए भक्ति में ब्रह्मचर्य का होना बहुत ही आवश्यक होता है।
Author: Amit Rajpoot
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