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बच्चों के मानसिक विकास में वो खेल अहम रोल निभाते हैं, जिन्हें वो खेलते हैं। इनमें हर खेल प्रभाव छोड़ता है. जी हाँ, यह समझने वाली बात है कि खेल चाहे मौलिक हो अथवा घर के भीतर खेले जा रहे खेलों में से कोई खेल अथवा आभासी खेल। इसमें से हर खेल अपनी प्रकृति के हिसाब से बच्चे के मानसिक विकास पर अपना असर छोड़ते हैं, जो उनमें किशोरावस्था में तो प्रभाव छोड़ते ही छोड़ते हैं, बल्कि उनका असर बड़े होने पर और भी गहराता जाता है। इसलिए ज़रूरी है कि आपका बच्चा जिस तरह के खेल का चुनाव करता है, आपको उसकी प्रकृति और उस खेल का आपके बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य पर जो असर पड़ेगा इसके बारे में जान लेना बड़ा ही ज़रूरी हो जाता है।
आपको बता दें कि तक़रीबन डेढ़ से दो दशक पहले तक बच्चों में मौलिक खेल खेले जाने की परंपरा बहुत ही जीवंत थी। बच्चे अपने घरों से दूर निकलकर मैदानों में, बाग़ और बग़ीचों में हरे-भरे पेड़-पौधों के बीच कुछ न कुछ खेलते थे। ग़ौरतलब है कि हरे-भरे पेड़-पौधों के बीच बच्चों का खेलना उनके हर तरह के स्वास्थ के लिए बहुत बेहतर साबित होता है। इसके असर उनके मस्तिष्क में सीधे तौर पड़ पड़ता था। लेकिन दुःखद और चिन्तनीय है कि आजकल के बच्चे मोबाइल गेम और वीडियो गेम में ज़्यादा दिलचस्पी रकते देखे जाते हैं, जिसके बड़े घातक परिणाम होते हैं।
वहीं, मौलिक खेलों को अपनाने से बच्चों का मानसिक विकास औसतन अधिक होता है। इतना ही नहीं, एक रिसर्च के मुताबिक घरों से दूर हरे पेड़-पौधों के बीच खेलने वाले बच्चों में आगे चलकर किसी भी तरह के मेंटल डिसॉर्डर का ख़तरा 55 फीसदी तक अपने आप कम हो जाता है. यानी कि मौलिक खेल खेलने वाले बच्चे आगे चलकर 45 फीसदी चिंता से ही लड़ते हैं, जबकि सामान्य बच्चों को चिन्ता के 100 फीसदी ख़तरों से ही लड़ना पड़ता है। इसलिए ज़रूरी है कि आपके बच्चे के पास मौलिक खेलों की दुनियाँ हो न कि वर्चुवल और इन-डोर खेलों की।
Author: Amit Rajpoot
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