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विजयनगर की नींव तैयार करने में एक माँ ने अपने बेटे के साथ जो किया, वो हैरान करने वाला है। अलाउद्दीन खिलजी और गयासुद्दीन तुगलक के जमाने की बात है। दक्षिण भारत के कर्नाटक में बल्लाल देव शासन कर रहे थे। बल्लाल देव बड़े महत्वाकांक्षी, स्वार्थी और घमण्डी राजा थे। उनकी महत्वाकांक्षा थी सात राज्यों को जीतकर चक्रवर्ती सम्राट बनने की। पांच राज्य वो जीत चुके थे और दो राज्य वारंगल और मदुरै उनके निशाने पर थे। चक्रवर्ती सम्राट बनने की उनकी महत्वाकांक्षा उन्हें और भी आसान लग रही थी क्योंकि ये दोनों राज्य उत्तर भारत से हो रहे मलेच्छ आक्रमणों के कारण कमजोर और जर्जर हो चुके थे। एक दिन बल्लाल देव के दरबार में एक वीर कृष्णाजी नायक एक गठरी लिए हाजिर हुए। सभा में मौजूद युवक हरिहर ने उनकी तरफ इशारा करते हुए बल्लाल देव से कहा, महाराज आपको सात राज्यों की विजयश्री चाहिए थी न, लीजिये कृष्णा जी आज आपके स्वप्न को पूरा करने वाला उपहार लेकर आये हैं। बल्लाल देव समेत सभासदों की उत्सुक नज़रें कृष्णा जी की ओर मुड़ गईं।
कृष्णा जी ने अपनी गठरी से वारंगल के महाराज प्रतापरुद्र का कटा हुआ सर बाहर निकाला। हरिहर ने बोलना शुरू किया- "महाराज ये कटा हुआ मस्तक वारंगल नरेश महाराज प्रतापरुद्र का है और उनका मस्तक हमने नहीं, बल्कि उनकी माता रुद्रमाम्बा देवी ने अपने हाथों से काटकर आपके लिए भेजा है और अपने पुत्र के इस कटे हुए मस्तक के साथ एक संदेश भी भेजा है। यह कहकर हरिहर ने महाराज बल्लाल देव के नाम रुद्रमाम्बा देवी का लिखा संदेश ऊँची आवाज़ में पढ़ना शुरू किया।
रुद्रमाम्बा देवी ने पत्र में लिखा था- "महाराज, मलेच्छों ने हमारे वारांगल पर आक्रमण कर दिया है। हमारे कई वीर सैनिक अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए बलिदान हो गये। वारंगल की पराजय निकट जानकार मैं इस आशंका से सिहर उठी कि विजित वारंगल की पवित्र भूमि, यहाँ के मंदिर, गौएँ और हमारी बेटियों के साथ ये मलेच्छ पता नहीं क्या करेंगे। आप यादव कुल बसंत हैं और हिन्दू जाति के रक्षक भी है परंतु चक्रवर्ती सम्राट बनने की लिप्सा के चलते आपसे हिन्दू जाति रक्षण का कर्तव्य विस्मरण हो गया और इसका भान आपको तब तक नहीं होगा जब तक आपके नाम के साथ चक्रवर्ती न जुड़ जाये। इसलिए मैंने स्वयं अपने हाथों से अपने पुत्र और वारंगल नरेश प्रतापरुद्र का सिर काटकर आपकी सेवा में भेज रही हूँ, ताकि आप इस कटे सर के साथ चक्रवर्ती सम्राट की उपाधि धारण करें। फिर वारंगल समेत बाकी राज्यों के हिन्दुओं का, उनके मंदिरों का, उनकी गौओं का तथा उनकी कन्यायों का रक्षण करें।"
माता रुद्रमाम्बा देवी का ये संदेश सुनकर बल्लाल देव काँप उठे और सम्राट बनने की अपनी इच्छा को त्यागकर हिन्दूधर्म और हिन्दूजाति रक्षण अभियान में जुट गये। इसी गठजोड़ और हिन्दू एकता ने महान हिन्दू राज्य विजयनगर की नींव तैयार की और यही हरिहरराय उसके शिल्पकार बने।
Author: Amit Rajpoot
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