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एक पुरानी कहावत है कि पूरी जनता को शिक्षित करना मुश्किल कार्य है। अतः एक राजा को पूर्ण शिक्षित कर दो तो वह सबको संभाल लेगा। वास्तव में भारतवर्ष के शासन-तंत्र का यही मूल वाक्य रहा है। लेकिन ज़रा सोचिए कि राजा को पूर्ण शिक्षित बनाने की गुंजाइश ही ख़त्म हो जाये तो फिर क्या बला खड़ी हो। यक़ीनन एक दिवालिये और पागलखाने भरे राज्य का ख़्याल हमारे दिमाग़ में अनायास आ जाता है। लेकिन ये सब तभी संभव होगा जब हमारे राजा का वो जनता चुनाव करे जिसके पूर्ण शिक्षित होने की न तो कोई गुंजाइश है और न ही उसे शिक्षित करने के लिए कोई कारगर प्रयास ही हो रहे हैं। ऐसे में राजा के चुनाव की ये प्रक्रिया हमारे समाज को बाँटने का ही प्रयास करेगी, ताकि समाज का दिवालियापन बना का बना रहे।
हैरानी की बात तो यह है कि इसका दंश आपको अभी तुरंत समझ नहीं आएगा। परंतु यदि आप आज भी गांवों में जाएं तो यह तुरंत समझ आ जाएगा। जिन गांवों में चुनाव नहीं हुए, वहां सामाजिक सौहार्द्र अधिक है। जहां पंचायत चुनाव होने लगे हैं, वहां सामाजिक विद्वेष बढ़ा है। यही स्थिति विधानसभा चुनाव भी पैदा करने लगे हैं। इस बढ़ते विद्वेष को सोशल मीडिया पर भी महसूस किया जा सकता है।
आपको बता दें कि मत प्रतिशत का खेल भी अजीब है। वर्ष 2014 में मत प्रतिशत नापने वाले बिहार चुनावों में मत प्रतिशत देखना नहीं चाह रहे। कायदे से देखा जाए तो जनता ने इन्हें नकारा है। मतलब साफ है जनमत से सरकारें नहीं बनतीं। सरकारें बनती हैं सीटों से और सीटों का जीता जाना जनमत को प्रदर्शित नहीं करता, वह तो पड़े वोटों के औसत का खेल भर है।
उपरोक्त सभी बातों का सीधा मतलब है कि चुनाव में कोई जीते या हारे, जनता के लिए बहुत फर्क नहीं पड़ने वाला है। कोई सड़क अधिक बनवाएगा, कोई कम, परंतु जनता को लूटेंगे सभी। आखिर सड़क बनाने के पैसे कोई भी सरकार कहीं से कमाकर नहीं लाती, जनता से ही वसूलती है। सरकारें कमाती नहीं हैं, इस मौलिक तथ्य को ध्यान में रखें। फिर सरकार से कुछ भी मुफ्त या अनुदान में पाने की इच्छा समाप्त हो जाएगी।
फिर आपको सरकार के कल्याणकारी स्वरूप की इच्छा भी नहीं रहेगी। सरकारें केवल न्याय करके ही समाज का कल्याण कर सकती है। इन चुनावों से हमें न्यायकारी सरकारें नहीं मिल रही हैं, बल्कि ये सरकारें चुनाव के माध्यम से हमारे समाज में हस्तक्षेप पैदा करती हैं और हमे बांटती हैं।
Author: Amit Rajpoot
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