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8 मार्च यानी अतंर्राष्ट्रीय महिला दिवस, जब आधी आबादी अपने अस्तित्व का जश्न मनाती है। भारत समेत दुनिया के तमाम देश इस दिन को सेलिब्रेट करते हैं। खासकर पढ़े लिखे और बौद्धिक वर्ग में इस दिन के प्रति खास ललक देखने को मिलती हैं, वहीं सोशल मीडिया के इस जमाने में इस दिन का चर्चा पहले से कहीं बढ़ गई है। लेकिन आपने सोचा है आखिर इस परम्परा की शुरुआत कब और कैसे हुई। अगर नहीं तो चलिए आज आपको अतंर्राष्ट्रीय महिला दिवस के इतिहास के बारे में बताते हैं।
दरअसल, 19वीं सदी की शुरूआत में अलग अलग देशो में महिलाओं के सम्मान और अधिकारों की रक्षा की मांग उठने लगी थी। जैसे कि 1909 को अमेरिका में कपड़ा मिलों में काम करने वाली महिलाओं ने अपने शोषण के खिलाफ आवाज उठाई थी और इसके चलते 28 फरवरी 1909 को सोशलिस्ट पार्टी ने इन्हें सम्मानित किया था, वहीं रूस में महिलाओं ने प्रथम विश्व युद्ध का विरोध करने के लिए ब्रेड एंड पीस आंदोलन की शुरुआत की थी।
ऐसे में महिलाओं के अधिकारों के लिए प्रतिबदध्ता को जताने और आधी आबादी की आवाज बुलंद करने के लिए की महिला दिवस आवश्यकता महसूस हुई और ये आइडिया भी एक औरत का ही था, जिसका नाम क्लारा जेटकिन था। दरअसल, जर्मन की रहने वाली क्लारा मार्क्सवादी चिंतक के साथ महिलाओं के अधिकारों के लिए सक्रिय थीं।
साल 1910 में कोपेनहेगन में हुए एक इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में क्लारा ने इंटरनेशनल वुमेन्स डे मनाने का सुझाव दिया था। उस वक्त उस कॉन्फ्रेंस में लगभग 17 देशों की 100 औरतें मौजूद थीं और उन सभी ने क्लारा के सुझाव का समर्थन किया। इसके बाद सबसे पहले 1911 में ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विट्ज़रलैंड जैसे देशो में में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया था। हालांकि अधिकारिक तौर पर महिला दिवस को मान्यता 1975 में मिली, जब संयुक्त राष्ट्र ने इसे हर साल इसे एक थीम के साथ मनाना शुरू किया। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की पहली थीम थी 'सेलीब्रेटिंग द पास्ट, प्लानिंग फॉर द फ्यूचर।'
वहीं इस बार हम 108वां अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस बैलेंस फॉर बेटर के थीम के साथ मना रहे हैं।
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